भारत शासन अधिनियम, 1858 (Government of India Act, 1858)
यह कानून 1857 की महान क्रांति (विद्रोह) के तुरंत बाद आया था। इसके तहत ब्रिटिश संसद ने ईस्ट इंडिया कंपनी को पूरी तरह खत्म करके भारत का राज-काज सीधे अपने हाथों में ले लिया।
प्रश्न : 1858 के अधिनियम के द्वारा बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स तथा बोर्ड ऑफ कंट्रोल को समाप्त करके इनके समस्त अधिकारों को किसे दे दिया गया था
उत्तर : भारत के राज्य सचिव को
सरल व्याख्या : ब्रिटेन में बैठी कंपनी की दोनों पुरानी कमेटियों (डायरेक्टर्स और कंट्रोल बोर्ड) को बंद कर दिया गया। उनकी जगह भारत का शासन संभालने के लिए ब्रिटिश सरकार में एक नया मंत्री पद बनाया गया, जिसे ‘भारत का राज्य सचिव’ (Secretary of State for India) कहा गया।
प्रश्न : भारत सरकार अधिनियम 1858 के तहत अब गवर्नर जनरल को क्या कहा जाने लगा
उत्तर : वायसराय
सरल व्याख्या : भारत के सबसे बड़े सरकारी पद का नाम बदल दिया गया। जो अफसर पहले ‘भारत का गवर्नर जनरल’ कहलाता था, उसे अब ‘वायसराय’ (ब्रिटिश रानी का सीधा प्रतिनिधि) कहा जाने लगा।
प्रश्न : ब्रिटिश संसद द्वारा ‘एक्ट फॉर दि बेटर गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया’ किस वर्ष पारित किया गया था
उत्तर : वर्ष 1858 ई. में
सरल व्याख्या : भारत में बेहतर शासन चलाने के नाम पर ब्रिटिश संसद ने इस ऐतिहासिक कानून को सन 1858 में पास (पारित) किया था।
प्रश्न : भारत के प्रथम वायसराय कौन थे
उत्तर : लॉर्ड कैनिंग
सरल व्याख्या : इस नए कानून के तहत पूरे भारत देश का सबसे पहला वायसराय बनने का मौका लॉर्ड कैनिंग को मिला।
प्रश्न : किस अधिनियम द्वारा निदेशक मण्डल और नियंत्रक मण्डल को समाप्त कर दिया गया
उत्तर : 1858 के अधिनियम द्वारा
सरल व्याख्या : जैसा कि ऊपर बताया गया, कंपनी के निदेशक मंडल (कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स) और नियंत्रक मंडल (बोर्ड ऑफ控制) को इसी कानून के तहत पूरी तरह खत्म (समाप्त) कर दिया गया।
प्रश्न : किस अधिनियम द्वारा भारत का शासन कम्पनी के हाथों से ले लिया गया और उसको ब्रिटिश ताज के अधीन कर दिया गया
उत्तर : भारत शासन अधिनियम, 1858
सरल व्याख्या : इस कानून के जरिए ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया और भारत की पूरी मालकियत ब्रिटेन की रानी यानी ‘ब्रिटिश ताज’ (British Crown) के हाथों में सौंप दी गई।
प्रश्न : भारत राज्य सचिव का ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी होने का क्या कारण था
उत्तर : उसका ब्रिटिश मंत्रिमण्डल का सदस्य होना
सरल व्याख्या : चूंकि भारत सचिव ब्रिटेन की सरकार में एक कैबिनेट मंत्री (मंत्रिमंडल का सदस्य) होता था, इसलिए उसे भारत में होने वाले हर काम या जवाबदेही के लिए ब्रिटेन की संसद के सामने खुद जवाब देना पड़ता था।
प्रश्न : 1858 के अधिनियम के तहत भारत सचिव की सहायता के लिए उपबन्ध किया गया था
उत्तर : 15 सदस्यीय भारत परिषद का
सरल व्याख्या : नए बने भारत सचिव (ब्रिटिश मंत्री) को सलाह और मदद देने के लिए ब्रिटेन में 15 सदस्यों की एक विशेष टीम बनाई गई, जिसे ‘भारत परिषद’ (India Council) कहा जाता था।
प्रश्न : किस अधिनियम के द्वारा भारत के गवर्नर-जनरल को भारत सचिव की आज्ञा के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य कर दिया गया
उत्तर : 1858 के अधिनियम द्वारा
सरल व्याख्या : यह साफ कर दिया गया कि भारत में बैठा वायसराय/गवर्नर-जनरल अपनी मर्जी से काम नहीं कर सकता। उसे ब्रिटेन में बैठे भारत सचिव के हुक्म और आज्ञा का पालन करने के लिए कानूनी रूप से मजबूर (बाध्य) कर दिया गया।
भारत परिषद अधिनियम, 1861 (Indian Councils Act, 1861)
यह कानून भारत में आधुनिक शासन प्रणाली, मंत्रिमंडलीय व्यवस्था और भारतीयों को कानून बनाने में शामिल करने की पहली शुरुआत थी। यह अधिनियम 1 अगस्त 1861 को पारित किया गया था।
प्रश्न : भारत परिषद अधिनियम, 1861 के द्वारा आपातकाल में अध्यादेश जारी करने की शक्ति किसे दी गयी थी
उत्तर : वायसराय को
सरल व्याख्या : अगर देश में संसद या परिषद की बैठक न चल रही हो और आपातकाल (इमरजेंसी) जैसी स्थिति आ जाए, तो वायसराय को अकेले ही सीधे नया अस्थाई कानून यानी ‘अध्यादेश’ (Ordinance) जारी करने की विशेष ताकत इसी एक्ट से मिली थी।
प्रश्न : आधुनिक भारत में सर्वप्रथम प्रतिनिधित्व प्रणाली का आरंभ करने वाला अधिनियम कौन-सा था
उत्तर : 1861 का भारत परिषद् अधिनियम
सरल व्याख्या : भारत में पहली बार एक ऐसी व्यवस्था की शुरुआत हुई जहाँ शासन और कानून बनाने की प्रक्रिया में स्थानीय या गैर-सरकारी लोगों को शामिल (प्रतिनिधित्व) किया जाने लगा।
प्रश्न : किस अधिनियम द्वारा मद्रास एवं बंबई की प्रेसीडेंसियों को पुनः विधायी शक्तियां देकर विकेंद्रीकरण के प्रक्रिया की शुरुआत की गई
उत्तर : भारत परिषद अधिनियम, 1861
सरल व्याख्या : 1833 के कानून में बंबई और मद्रास के गवर्नरों से जो कानून बनाने का हक छीन लिया गया था, उसे इस 1861 के कानून के जरिए वापस (पुनः विधायी शक्तियां) दे दिया गया। इसे राजनीति में विकेंद्रीकरण (Decentralization – ताकतों को बांटना) की शुरुआत माना जाता है।
प्रश्न : किस अधिनियम के द्वारा सर्वप्रथम भारतीयों को कानून बनाने की प्रक्रिया में सम्मिलित किया गया
उत्तर : 1861 का अधिनियम
सरल व्याख्या : यह भारतीयों के लिए बहुत महत्वपूर्ण कदम था। वायसराय ने अपनी कानून बनाने वाली टीम में पहली बार 3 भारतीयों (बनारस के राजा, पटियाला के महाराजा और सर दिनकर राव) को शामिल (सम्मिलित) किया।
प्रश्न : 1861 वें भारतीय परिषद अधिनियम द्वारा वायसराय की कार्यकारी परिषद में विधि-निर्माण हेतु सम्मिलित किये जाने वाले कितने अतिरिक्त सदस्यों की संख्या का उपबन्ध किया गया था
उत्तर : न्यूनतम 6 तथा अधिकतम 12 सदस्य
सरल व्याख्या : वायसराय की टीम में कानून बनाने (विधि-निर्माण) के काम के लिए बाहर से जोड़े जाने वाले अतिरिक्त सदस्यों (जिनमें भारतीय भी शामिल थे) की संख्या तय की गई थी। कम से कम 6 और ज़्यादा से ज़्यादा 12 नए सदस्य इसमें रखे जा सकते थे।
प्रश्न : किस अधिनियम में विधि निर्माण के क्षेत्र में ‘शक्ति विभाजन के सिद्धांत’ की कल्पना की गयी थी
उत्तर : भारतीय परिषद अधिनियम, 1861
सरल व्याख्या : इस कानून में पहली बार यह सोचा या तय किया गया कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच कानून बनाने की ताकतों को अलग-अलग बांट (शक्ति विभाजन) दिया जाना चाहिए।
प्रश्न : भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 के अंतर्गत प्रांतों में स्थापित की गयी विधान परिषदें थीं
उत्तर : बंगाल (1862 ई.), उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रान्त (1866 ई.), पंजाब (1897 ई.)
सरल व्याख्या : इस कानून के तहत सिर्फ केंद्र में ही नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग प्रांतों (राज्यों) में भी कानून बनाने के लिए नई लोकल विधानसभाएं (विधान परिषदें) खोली गईं—जैसे बंगाल में 1862 में, उत्तर-पश्चिमी प्रांत में 1866 में और पंजाब में 1897 में।
प्रश्न : 1861 के भारतीय परिषद अधिनियम द्वारा वायसराय की परिषद को कानून बनाने की शक्ति प्रदान की गई, जिसके तहत लार्ड केनिंग ने शुरुआत की
उत्तर : विभागीय प्रणाली की
सरल व्याख्या : इसे आज की ‘पोर्टफोलियो सिस्टम’ या ‘मंत्रिमंडल व्यवस्था’ कहते हैं। लॉर्ड कैनिंग ने पहली बार अपनी टीम के अलग-अलग अफसरों को अलग-अलग सरकारी विभाग (जैसे—गृह विभाग, रक्षा विभाग, वित्त विभाग) सौंपे, जिससे आधुनिक भारत की मंत्री-प्रणाली की नींव पड़ी।
प्रश्न : भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 द्वारा वायसराय की कार्यकारी परिषद में सम्मिलित किये जाने वाले अतिरिक्त सदस्यों का कार्यकाल था
उत्तर : 2 वर्ष
सरल व्याख्या : कानून बनाने की इस टीम में जो भी अतिरिक्त या नए सदस्य चुने जाते थे, वे केवल 2 साल के समय (कार्यकाल) के लिए ही पद पर रह सकते थे।
प्रश्न : वायसराय की कार्यकारी परिषद में विधि सदस्य को किस रूप में सम्मिलित किया गया था
उत्तर : पांचवें सदस्य के रूप में
सरल व्याख्या : वायसराय की मुख्य प्रशासनिक टीम में कानून के जानकार (विधि सदस्य) को एक पक्के मेंबर के रूप में जगह दी गई, जिससे वह परिषद का पांचवां सदस्य बन गया।
प्रश्न : किस अधिनियम ने मद्रास तथा बम्बई प्रांतों की विधान सभाओं को विधि-निर्माण हेतु सशक्त किया था
उत्तर : भारतीय परिषद अधिनियम, 1861
सरल व्याख्या : इस कानून ने मद्रास और बम्बई के गवर्नरों की टीमों को दोबारा अपने राज्य के स्थानीय कानून खुद बनाने के लिए कानूनी रूप से मजबूत (सशक्त) कर दिया था।
प्रश्न : वह अधिनियम जिसमें भविष्य की प्रतिनिधि सरकार के शुभारम्भ का प्रथम प्रयास था
उत्तर : भारतीय परिषद अधिनियम, 1861
सरल व्याख्या : इस कानून को भारत में भविष्य की एक ऐसी सरकार की पहली सीढ़ी (प्रथम प्रयास) माना जाता है, जहाँ जनता के प्रतिनिधि मिलकर शासन चलाते हैं, क्योंकि इसमें पहली बार गैर-सरकारी लोगों को शामिल किया गया था।
प्रश्न : वायसराय को परिषद के कार्य संचालन हेतु नियमों तथा आदेशों के निर्माण का अधिकार किस अधिनियम द्वारा दिया गया था
उत्तर : 1861 के भारतीय परिषद अधिनियम द्वारा
सरल व्याख्या : वायसराय को यह पूरी कानूनी ताकत मिल गई कि वह अपने दफ्तर और परिषद के रोजमर्रा के कामों को अनुशासन से चलाने के लिए खुद नए नियम और आदेश बना सके।
प्रश्न : भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 के अधीन गठित वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में प्रशासनिक सेवा के सदस्यों की संख्या कितनी थी
उत्तर : तीन
सरल व्याख्या : वायसराय की मुख्य प्रशासनिक टीम में देश का राज-काज और प्रशासन संभालने वाले अनुभवी अफ़सरों (सिविल सर्वेंट्स) की संख्या कुल 3 तय की गई थी।
प्रश्न : वायसराय को अपनी परिषद के सदस्यों में कार्य विभाजन (पोर्टफोलियो या विभागों का बंटवारा) का अधिकार किस अधिनियम द्वारा दिया गया
उत्तर : भारतीय परिषद अधिनियम, 1861
सरल व्याख्या : जैसा कि पिछले पन्ने पर बताया गया था, वायसराय को यह हक मिला कि वह अपने मंत्रियों को अलग-अलग काम या मंत्रालय (पोर्टफोलियो/विभाग) बांट सके, जिससे देश में आधुनिक मंत्रिमंडल प्रणाली की शुरुआत हुई।
भारत परिषद अधिनियम, 1892 (Indian Councils Act, 1892)
यह कानून भारत में पहली बार अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली (Indirect Election) की शुरुआत और बजट पर नेताओं को बोलने का अधिकार देने के लिए जाना जाता है।
प्रश्न : केंद्रीय विधान परिषद में अतिरिक्त सदस्यों का निर्धारित कार्यकाल कितना था
उत्तर : 2 वर्ष
सरल व्याख्या : इस 1892 के कानून में भी केंद्र की परिषद में बाहर से आने वाले अतिरिक्त सदस्यों के काम करने का समय (कार्यकाल) पुराने नियम की तरह ही 2 साल का रखा गया था।
प्रश्न : बम्बई तथा मद्रास की परिषदों में, गवर्नर द्वारा नियुक्त किये जाने वाले अतिरिक्त सदस्यों की संख्या निर्धारित की गयी
उत्तर : न्यूनतम 8 तथा अधिकतम 20 अतिरिक्त सदस्य
सरल व्याख्या : राज्यों के स्तर पर भी गवर्नरों की परिषदों का विस्तार किया गया। बम्बई और मद्रास की लोकल काउंसिलों में कम से कम 8 और अधिकतम 20 अतिरिक्त मेंबर रखने का नियम बना।
प्रश्न : केन्द्रीय विधान परिषद सहित वायसराय को अतिरिक्त सदस्यों के मनोनयन का अधिकार किस अधिनियम के द्वारा दिया गया था
उत्तर : भारतीय परिषद अधिनियम, 1892
सरल व्याख्या : इस नए कानून के तहत मुख्य संसद (केन्द्रीय विधान परिषद) में और ज़्यादा गैर-सरकारी सदस्यों को सीधे अपनी मर्जी से नामजद या चुनने (मनोनयन) की ताकत वायसराय को दी गई।
प्रश्न : केंद्रीय विधान परिषद में अतिरिक्त सदस्यों के निर्वाचन हेतु कौन-सी रीति अपनाई गई
उत्तर : परोक्ष निर्वाचन रीति
सरल व्याख्या : इसे आम भाषा में अप्रत्यक्ष चुनाव (Indirect Election) कहते हैं। इसका मतलब है कि देश की आम जनता सीधे वोट नहीं डालती थी, बल्कि कुछ विशेष संस्थाएं मिलकर इन सदस्यों को चुनती थीं।
प्रश्न : केन्द्रीय विधान परिषद में मनोनीत किये जाने वाले अतिरिक्त सदस्यों की संख्या निर्धारित की गयी
उत्तर : न्यूनतम 10 तथा अधिकतम 16
सरल व्याख्या : 1861 के कानून के मुकाबले इस बार सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गई। अब केंद्र की परिषद में कम से कम 10 और ज़्यादा से ज़्यादा 16 अतिरिक्त सदस्य रखे जा सकते थे।
प्रश्न : बंगाल प्रांत की परिषद में गवर्नर द्वारा नियुक्त किये जाने वाले अतिरिक्त सदस्यों की संख्या कितनी निश्चित की गयी
उत्तर : अधिकतम 20 सदस्य
सरल व्याख्या : बंगाल की राज्य परिषद (विधानसभा) का दायरा तय करते हुए वहां का गवर्नर ज़्यादा से ज़्यादा 20 अतिरिक्त सदस्यों को अपनी टीम में रख सकता था।
प्रश्न : 1892 के अधिनियम के तहत केंद्रीय परिषद के गैर-सरकारी सदस्यों का निर्वाचन किस प्रकार का होता था
उत्तर : प्रान्तीय परिषदों के गैर-सरकारी सदस्यों की सिफारिश पर
सरल व्याख्या : मुख्य केंद्र सरकार की परिषद (संसद) में जो गैर-सरकारी मेंबर बैठते थे, उन्हें राज्यों के विधायक (प्रान्तीय परिषदों के सदस्य) मिलकर चुनते और सिफारिश करते थे।
प्रश्न : आपातकाल या विशेष आवश्यकता की स्थिति में गवर्नर जनरल को व्यवस्थापिका सभा की मदद से प्रांतों के लिए विधि-निर्माण का अधिकार देने वाला अधिनियम था
उत्तर : भारतीय परिषद अधिनियम, 1892
सरल व्याख्या : अगर देश में कोई इमरजेंसी (आपातकाल) आ जाए, तो वायसराय राज्यों की लोकल विधानसभाओं की मदद लेकर किसी भी प्रांत के लिए सीधे कानून बना सकता था।
प्रश्न : किस अधिनियम द्वारा केंद्रीय तथा प्रान्तीय दोनों विधान परिषदों के सदस्यों को बजट पर बहस करने एवं प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया था
उत्तर : भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 द्वारा
सरल व्याख्या : यह भारतीय नेताओं की एक बहुत बड़ी जीत थी। पहली बार उन्हें देश के बजट (खर्चे और कमाई के हिसाब) पर खुलकर बोलने (बहस करने) और सरकार से सवाल पूछने का कानूनी अधिकार मिला।
प्रश्न : 1892 के अधिनियम के अंतर्गत नवीन विधि निर्माण के तहत प्रान्तीय व्यवस्थापिका सभाओं के लिए अनिवार्य था
उत्तर : गवर्नर जनरल (वायसराय) की पूर्व स्वीकृति
सरल व्याख्या : अगर राज्यों की विधानसभाएं (प्रान्तीय व्यवस्थापिका) कोई नया कानून (नवीन विधि) बनाना चाहती थीं, तो उन्हें बिल पेश करने से पहले ही देश के वायसराय से एडवांस में मंजूरी (पूर्व स्वीकृति) लेना ज़रूरी कर दिया गया था।
प्रश्न : 1892 के अधिनियम के अधीन प्रान्तीय परिषद के अतिरिक्त सदस्यों का चुनाव किया जाता था
उत्तर : विश्वविद्यालयों, नगरपालिका, जिला परिषद, व्यापार संघ, जमींदारों आदि की सिफारिशों पर
सरल व्याख्या : राज्यों की विधानसभाओं में जो गैर-सरकारी सदस्य आते थे, उन्हें चुनने के लिए यूनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय), नगर पालिकाएं, जिला बोर्ड और बड़े-बड़े जमींदार मिलकर वायसराय को नामों की सिफारिश भेजते थे।
प्रश्न : 1892 के अधिनियम की आलोचना करने वाले नरमदलीय नेताओं के नेतृत्वकर्ता थे
उत्तर : गोपाल कृष्ण गोखले
सरल व्याख्या : कांग्रेस के नरम दल के महान नेता गोपाल कृष्ण गोखले ने इस कानून की कमियों (जैसे पूरक प्रश्न न पूछ पाना) को लेकर इसकी जमकर आलोचना (बुराई) की थी।
प्रश्न : 1892 के अधिनियम के अधीन गठित होने वाली व्यवस्थापिका सभाओं (केन्द्रीय तथा प्रांतीय) के सदस्य किस प्रकार के प्रश्न नहीं पूछ सकते थे
उत्तर : पूरक प्रश्न तथा तर्क पूर्ण प्रश्न
सरल व्याख्या : इस कानून की यह बहुत बड़ी कमी थी। भारतीय नेताओं को सवाल पूछने का हक तो मिला, लेकिन अगर सरकार कोई अधूरा या गलत जवाब देती थी, तो वे उसके ऊपर दोबारा सवाल (पूरक प्रश्न / Follow-up Question) नहीं पूछ सकते थे।
प्रश्न : 1892 के अधिनियम द्वारा किये गये सुधारों का पूर्ण लाभ उठाने की सलाह देने वाले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता कौन थे
उत्तर : सुरेन्द्रनाथ बनर्जी
सरल व्याख्या : कांग्रेस के एक और बड़े नेता सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का मानना था कि भले ही इस कानून में कमियां हैं, लेकिन हमें इसके तहत मिली ताकतों (जैसे बजट पर बहस) का पूरा फायदा उठाकर शासन में शामिल होना चाहिए।
प्रश्न : 1892 के अधिनियम द्वारा स्थापित व्यवस्थापिका सभाओं की वास्तविक स्थिति थी
उत्तर : परामर्शदात्री परिषदों जैसी
सरल व्याख्या : इन विधानसभाओं के पास असली ताकत नहीं थी। सरकार इनके फैसलों को मानने के लिए मजबूर नहीं थी, इसलिए ये सिर्फ सलाह देने वाली (परामर्शदात्री) कमेटियां बनकर रह गई थीं।
प्रश्न : 1892 के अधिनियम के अधीन गठित होने वाली केंद्रीय परिषद के सदस्य बनने वाले प्रमुख भारतीय नेता थे
उत्तर : गोपाल कृष्ण गोखले, रास बिहारी बोस तथा सुरेन्द्रनाथ बनर्जी
सरल व्याख्या : इस कानून के तहत देश की मुख्य संसद (केंद्रीय परिषद) में चुनकर पहुंचने वाले सबसे पहले बड़े भारतीय नेता ये तीनों ही थे।
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