भारत परिषद अधिनियम, 1909(मार्ले-मिंटो सुधार,1909)

भारत परिषद अधिनियम, 1909 (Indian Councils Act, 1909)

इसे इतिहास में ‘मार्ले-मिंटो सुधार’ कहा जाता है। यह कानून भारत में हिंदुओं और मुसलमानों के लिए अलग चुनाव प्रणाली (सांप्रदायिक निर्वाचन) शुरू करने के लिए जाना जाता है, जिसने आगे चलकर देश के विभाजन की नींव रखी।

प्रश्न :  भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 को अन्य किस नाम से जाना जाता है

उत्तर : मार्ले मिंटो सुधार के नाम से

सरल व्याख्या : उस समय भारत के राज्य सचिव ‘लॉर्ड मार्ले’ थे और भारत के वायसराय ‘लॉर्ड मिंटो’ थे। इन दोनों के नाम को मिलाकर ही इसे मार्ले-मिंटो सुधार कहा जाता है।

प्रश्न :  भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 किस वर्ष लागू हुआ था

उत्तर : जनवरी 1910 में

सरल व्याख्या : यह कानून ब्रिटिश संसद ने 1909 में पास किया था, लेकिन इसे भारत देश में जनवरी 1910 से पूरी तरह लागू किया गया।

प्रश्न : भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 द्वारा वायसराय की केन्द्रीय परिषद में अतिरिक्त सदस्यों की संख्या बढ़ाकर दी थी

उत्तर : 60 सदस्य

सरल व्याख्या : केंद्र की संसद का दायरा बहुत बड़ा कर दिया गया। जो अतिरिक्त सदस्य पहले अधिकतम 16 हुआ करते थे, उनकी संख्या सीधे बढ़ाकर 60 कर दी गई।

प्रश्न :  1909 के अधिनियम द्वारा वायसराय की परिषद की कुल सदस्य संख्या कितनी हो गयी थी

उत्तर : 69 सदस्य

सरल व्याख्या : अगर मुख्य सरकारी अफ़सरों (9 पक्के सदस्य) और इन नए 60 अतिरिक्त सदस्यों को मिला दिया जाए, तो संसद में बैठने वाले लोगों की कुल संख्या 69 हो गई थी।

प्रश्न :  किस अधिनियम द्वारा मुसलमानों के लिए पृथक सामुदायिक प्रतिनिधित्व प्रणाली लागू की गयी थी

उत्तर : भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 द्वारा

सरल व्याख्या : इसे पृथक निर्वाचन (Separate Electorate) कहते हैं। इसका मतलब था कि मुस्लिम उम्मीदवारों को केवल मुस्लिम मतदाता (वोटर) ही वोट डाल सकते थे। यह धर्म के आधार पर चुनाव कराने की शुरुआत थी।

प्रश्न :  साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था द्वारा भविष्य में देश विभाजन की आधारशिला तैयार करने वाला अधिनियम था

उत्तर :भारतीय परिषद अधिनियम, 1909

सरल व्याख्या : इस कानून ने हिंदू और मुसलमानों के बीच राजनीतिक दूरी को बहुत बढ़ा दिया, जिसे इतिहासकारों के अनुसार आगे चलकर 1947 में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे (देश विभाजन) की मुख्य नींव (आधारशिला) माना जाता है।

प्रश्न :  लॉर्ड मिंटो ने मुसलमानों को निर्वाचन संबंधी कौन-सी सुविधाएं प्रदान की थी

उत्तर : पृथक निर्वाचन

सरल व्याख्या : जैसा ऊपर बताया गया, वायसराय लॉर्ड मिंटो ने मुस्लिम समुदाय के लिए अलग से चुनाव लड़ने और वोट डालने (पृथक निर्वाचन) की विशेष कानूनी व्यवस्था या सुविधा शुरू की थी।

प्रश्न :  साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व का जन्मदाता किसे माना जाना है

उत्तर : लॉर्ड मिंटो को

सरल व्याख्या : भारत के चुनावों में धर्म और संप्रदाय का जहर घोलने की शुरुआत करने के कारण उस समय के वायसराय लॉर्ड मिंटो को ही ‘सांप्रदायिक चुनाव का पिता या जन्मदाता’ कहा जाता है।

प्रश्न :  भारत सचिव लॉर्ड मार्ले ने निर्वाचन हेतु किस निर्वाचक मण्डल की सिफारिश की थी

उत्तर : मिश्रित निर्वाचन मण्डल

सरल व्याख्या : ब्रिटेन में बैठे भारत सचिव लॉर्ड मार्ले पहले इसके पक्ष में नहीं थे, वे चाहते थे कि चुनाव सबके लिए मिले-जुले (मिश्रित निर्वाचक मंडल) तरीके से ही हों, लेकिन बाद में मिंटो के दबाव में वे मान गए।

प्रश्न :  वह अधिनियम जिसके द्वारा विधि-निर्मात्री परिषद का नाम सर्वप्रथम 'व्यवस्थापिका सभा' रखा गया था

उत्तर : भारतीय परिषद अधिनियम, 1909

सरल व्याख्या : देश के लिए कानून बनाने वाली पुरानी टीम (विधि-निर्मात्री परिषद) का नाम बदलकर पहली बार आधिकारिक रूप से ‘व्यवस्थापिका सभा’ (Legislative Assembly) किया गया।

प्रश्न :  सुधारों की प्रकृति तथा प्रतिनिधित्व विस्तार के संदर्भ में रिपोर्ट देने हेतु लॉर्ड मिंटो द्वारा नियुक्त की गयी समिति के अध्यक्ष कौन-थे

उत्तर : ए.टी. अरूण्डेल

सरल व्याख्या : भारत में राजनीतिक सुधार कैसे किए जाएं और काउंसिल में कितने नए सदस्य बढ़ाए जाएं, इसकी जांच और रिपोर्ट तैयार करने के लिए वायसराय मिंटो ने ‘अरूण्डेल समिति’ बनाई थी।

प्रश्न :  भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 के तहत वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में किसे प्रथम भारतीय सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया

उत्तर : सत्येन्द्र प्रसाद सिन्हा को

सरल व्याख्या : यह बहुत ऐतिहासिक घटना थी। वायसराय की मुख्य प्रशासनिक और कानूनी टीम (एग्जीक्यूटिव काउंसिल) में शामिल होने वाले सबसे पहले भारतीय व्यक्ति सत्येंद्र प्रसन्न (प्रसाद) सिन्हा बने, जिन्हें कानून मंत्री (विधि सदस्य) बनाया गया था।

प्रश्न :  केंद्रीय एवं प्रान्तीय व्यवस्थापिका सभाओं की व्यवस्था और शक्तियों के विस्तार का अधिनियम था

उत्तर :भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 का

सरल व्याख्या : इस कानून ने दिल्ली (केंद्र) और राज्यों (प्रांतों) दोनों की विधानसभाओं का दायरा बड़ा किया और भारतीय नेताओं को पहले से अधिक ताकतें (शक्तियां) दीं।

प्रश्न :  भारत परिषद अधिनियम, 1909 के अंतर्गत केंद्रीय तथा प्रान्तीय व्यवस्थापिका सभाओं में सदस्यों के संदर्भ में बनाये जाने वाले अधिनियमों के लिए क्या आवश्यक था

उत्तर : सपरिषद् भारत सचिव की स्वीकृति प्राप्त करना

सरल व्याख्या : इन विधानसभाओं के सदस्यों से जुड़ा या चुनावों से जुड़ा कोई भी नया नियम बनाने से पहले ब्रिटेन में बैठे भारत सचिव और उनकी टीम की लिखित मंजूरी (स्वीकृति) लेना अनिवार्य था।

प्रश्न :  1909 के परिषद कानून के अनुसार विशिष्ट निर्वाचन क्षेत्रों की कितनी श्रेणियां थीं

उत्तर : तीन

सरल व्याख्या : चुनाव क्षेत्रों को तीन अलग-अलग श्रेणियों (कैटेगरी) में बांटा गया था—सामान्य चुनाव क्षेत्र, मुसलमानों के लिए विशेष वर्ग क्षेत्र और जमींदारों/व्यापारियों के लिए विशेष क्षेत्र।

प्रश्न :  विधायी परिषदों में पूरक प्रश्न पूछने की व्यवस्था किस अधिनियम द्वारा की गयी थी

उत्तर : भारतीय परिषद अधिनियम, 1909

सरल व्याख्या : 1892 के कानून की जो बहुत बड़ी कमी थी (कि नेता दोबारा सवाल नहीं पूछ सकते थे), उसे इस कानून में सुधार दिया गया। अब भारतीय नेताओं को सरकार के जवाब पर दोबारा सवाल (पूरक प्रश्न / Follow-up Question) पूछने की आजादी मिल गई।

प्रश्न :  विधायी परिषदों में लोकहित के विषयों को प्रस्तुत करने का अधिकार देने वाला अधिनियम था

उत्तर :भारतीय परिषद अधिनियम, 1909

सरल व्याख्या : भारतीय सदस्यों को यह कानूनी हक मिल गया कि वे जनता की भलाई और समाज की मुख्य समस्याओं (लोकहित के विषयों) पर संसद में चर्चा के लिए प्रस्ताव पेश कर सकें।


Discover more from GkTextBook

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

error: Content is protected !!

Discover more from GkTextBook

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading