भारतीय संसद के अनुच्छेद (79 से 122), राष्ट्रपति की विधायी शक्तियां (123)

भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर हमारी संसद है, जहाँ देश के भविष्य के कानून बनते हैं. भारतीय संविधान के भाग 5 के अध्याय 2 में अनुच्छेद 79 से 122 तक भारतीय संसद (Parliament) के गठन, संरचना, अवधियों, अधिकारियों और विधायी प्रक्रियाओं का विस्तृत विवरण दिया गया है. इसके तुरंत बाद, अध्याय 3 का अनुच्छेद 123 राष्ट्रपति को एक विशेष विधायी शक्ति (अध्यादेश जारी करने की शक्ति) देता है. इस पोस्ट में हम इन सभी महत्वपूर्ण अनुच्छेदों को बहुत ही आसान और सरल हिंदी में समझेंगे, जो आपकी प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC, SSC, State PCS) के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं.

अध्याय 2.भारतीय संसद(Parliament): अनुच्छेद 79 से 122 की पूरी जानकारी

संसद का गठन और संरचना (अनुच्छेद 79 से 81)For UPPCS,BPSC,MPPSC,HEO,SSC,RO ARO,LOWER PCS

यह देश की सबसे बड़ी कानून बनाने वाली संस्था, ‘संसद’ (Parliament) के बारे में है।

 अनुच्छेद : 79. संसद का गठन

सरल व्याख्या :हमारे देश की संसद तीन चीजों से मिलकर बनेगी—राष्ट्रपति, राज्यसभा (ऊपरी सदन) और लोकसभा (निचला सदन)।

 अनुच्छेद : 80. राज्य सभा की संरचना

सरल व्याख्या :राज्यसभा में अधिकतम 250 सदस्य हो सकते हैं। इनमें से 12 सदस्यों को राष्ट्रपति कला, विज्ञान, साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र से सीधे चुनते हैं (मनोनित करते हैं)।

 अनुच्छेद : 81. लोक सभा की संरचना

सरल व्याख्या :लोकसभा के सदस्यों (सांसदों) को देश की जनता सीधे वोट डालकर चुनती है।

जनगणना, अवधि और योग्यताएं (अनुच्छेद 82 से 88)

 अनुच्छेद : 82. प्रत्येक जनगणना के पश्चात् पुनः समायोजन

सरल व्याख्या :हर नई जनगणना (Census) के बाद देश में लोकसभा और राज्यसभा की सीटों के दायरे को दोबारा तय किया जाएगा, ताकि आबादी के हिसाब से नेता चुने जा सकें।

 अनुच्छेद : 83. संसद के सदनों की अवधि

सरल व्याख्या :लोकसभा का कार्यकाल 5 साल का होता है (इसे पहले भी भंग किया जा सकता है)। राज्यसभा एक स्थाई सदन है जो कभी भंग नहीं होता, इसके सदस्य 6 साल के लिए चुने जाते हैं।

 अनुच्छेद : 84. संसद की सदस्यता के लिए अर्हता

सरल व्याख्या :सांसद बनने के लिए क्या योग्यता चाहिए? जैसे—वह भारत का नागरिक हो, लोकसभा के लिए कम से कम 25 वर्ष और राज्यसभा के लिए कम से कम 30 वर्ष की उम्र हो।

 अनुच्छेद : 85. संसद के सत्र, सत्रावसान और विघटन

सरल व्याख्या :संसद की बैठकें (जैसे बजट सत्र, मानसून सत्र) बुलाने और लोकसभा को भंग करने की शक्ति राष्ट्रपति के पास है। दो सत्रों के बीच 6 महीने से ज्यादा का अंतर नहीं होना चाहिए।

 अनुच्छेद : 86. सदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का राष्ट्रपति का अधिकार

सरल व्याख्या :राष्ट्रपति संसद के किसी भी सदन में आकर भाषण दे सकते हैं या अपना कोई जरूरी संदेश (Message) भिजवा सकते हैं।

 अनुच्छेद : 87. राष्ट्रपति का विशेष अभिभाषण

सरल व्याख्या :हर नए चुनाव के बाद और हर साल के पहले सत्र (बजट सत्र) की शुरुआत में राष्ट्रपति दोनों सदनों को एक साथ बुलाकर विशेष भाषण देते हैं।

 अनुच्छेद : 88. सदनों के बारे में मंत्रियों और महान्यायवादी के अधिकार

सरल व्याख्या :देश का कोई भी मंत्री या महान्यायवादी (Attorney General) संसद के दोनों सदनों की बैठक में बैठ सकता है और बोल सकता है। लेकिन महान्यायवादी को वहाँ वोट (Vote) डालने का अधिकार नहीं होता।

संसद के अधिकारी (Officers of Parliament) – अनुच्छेद 89 से 98

यह संसद को चलाने वाले मुख्य पदाधिकारियों (स्पीकर और चेयरमैन) के नियम हैं।

 अनुच्छेद : 89. राज्यसभा का सभापति और उपसभापति

सरल व्याख्या :देश का उपराष्ट्रपति ही राज्यसभा का सभापति (चेयरमैन) होता है। इसके अलावा राज्यसभा अपने सदस्यों में से एक उपसभापति (डिप्टी चेयरमैन) भी चुनती है।

 अनुच्छेद : 90. उपसभापति का पद रिक्त होना, पदत्याग और पद से हटाया जाना

सरल व्याख्या :राज्यसभा के उपसभापति को पद से कैसे हटाया जा सकता है या वे अपना इस्तीफा किसे सौंपेंगे, इसके नियम।

 अनुच्छेद : 91. सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन करने या सभापति के रूप में कार्य करने की उपसभापति या अन्य व्यक्ति की शक्ति

सरल व्याख्या :जब सभापति (उपराष्ट्रपति) मौजूद न हों, तो उनकी जगह उपसभापति या संसद द्वारा तय किया गया कोई अन्य व्यक्ति राज्यसभा की बैठक संभालेगा।

 अनुच्छेद : 92. जब सभापति या उपसभापति को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना

सरल व्याख्या :अगर राज्यसभा में सभापति या उपसभापति को उनके पद से हटाने का केस चल रहा हो, तो वे उस समय बैठक के मुख्य जज या अध्यक्ष (पीठासीन अधिकारी) के रूप में कुर्सी पर नहीं बैठ सकते।

 अनुच्छेद : 93. लोक सभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष

सरल व्याख्या :लोकसभा के सांसद अपने बीच में से ही बैठक चलाने के लिए एक अध्यक्ष (Speaker) और एक उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) को चुनते हैं।

 अनुच्छेद : 94. अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना, पदत्याग और पद से हटाया जाना

सरल व्याख्या :लोकसभा स्पीकर और डिप्टी स्पीकर के इस्तीफा देने या उन्हें पद से हटाने की कानूनी प्रक्रिया।

 अनुच्छेद : 95. अध्यक्ष के पद के कर्तव्यों का पालन करने या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्यक्ष या अन्य व्यक्ति की शक्ति

सरल व्याख्या :अगर लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) बीमार या अनुपस्थित हैं, तो उनकी जगह उपाध्यक्ष लोकसभा की कार्यवाही संभालेंगे।

 अनुच्छेद : 96. जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना

सरल व्याख्या :जब लोकसभा अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का प्रस्ताव संसद में चल रहा हो, तो वे उस दिन सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते।

 अनुच्छेद : 97. सभापति और उपसभापति तथा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन और भत्ते

सरल व्याख्या :लोकसभा और राज्यसभा को चलाने वाले इन चारों मुख्य अधिकारियों को मिलने वाली सैलरी (वेतन) और सरकारी सुविधाएं कितनी होंगी, यह संसद कानून बनाकर तय करती है।

 अनुच्छेद : 98. संसद का सचिवालय

सरल व्याख्या :लोकसभा और राज्यसभा का अपना एक अलग स्टाफ और दफ्तर (Secretariat) होता है, जो संसद के कागजी और प्रशासनिक कामों को संभालता है।

कार्य संचालन (Conduct of Business) – अनुच्छेद 99 और 100

यह संसद के अंदर कामकाज शुरू करने और वोटिंग के बुनियादी नियम बताता है।

 अनुच्छेद : 99. सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान

सरल व्याख्या :चुनाव जीतने के बाद कोई भी सांसद (MP) संसद की बैठक में तब तक नहीं बैठ सकता, जब तक वह राष्ट्रपति या उनके द्वारा तय व्यक्ति के सामने देश के प्रति वफादारी की शपथ (कसम) न ले ले।

 अनुच्छेद : 100. सदनों में मतदान, रिक्तियों के होते हुए भी सदनों की कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति

सरल व्याख्या :संसद में कोई भी फैसला बहुमत के आधार पर वोटिंग से होगा। इसमें ‘गणपूर्ति’ (Quorum) का नियम है, जिसका मतलब है कि संसद की बैठक तभी शुरू हो सकती है जब कम से कम 10% (1/10) सांसद मौजूद हों।

सदस्यों की निरर्हताएं (Disqualifications of Members) – अनुच्छेद 101 से 104

यह सांसदों की सीट खाली होने और उन्हें अयोग्य घोषित करने के नियम हैं।

 अनुच्छेद : 101. स्थानों का रिक्त होना

सरल व्याख्या :कोई भी व्यक्ति एक साथ लोकसभा और राज्यसभा दोनों का सदस्य नहीं रह सकता। अगर कोई सांसद बिना बताए 60 दिनों तक संसद से गायब रहता है, तो उसकी सीट खाली मान ली जाएगी।

 अनुच्छेद : 102. सदस्यता के लिए निरर्हताएं

सरल व्याख्या :किसी सांसद को अयोग्य (Disqualify) कब माना जाएगा? जैसे—अगर वह किसी सरकारी लाभ के पद पर हो, दिवालिया (Bankrupt) हो जाए, या भारत की नागरिकता छोड़ दे। (इसी में दलबदल कानून भी आता है)।

 अनुच्छेद : 103. सदस्यों की निरर्हताओं से संबंधित प्रश्नों पर विनिश्चय

सरल व्याख्या :अगर किसी सांसद की योग्यता या अयोग्यता पर कोई विवाद होता है, तो राष्ट्रपति चुनाव आयोग (Election Commission) की सलाह लेकर इस पर अंतिम फैसला करेंगे।

 अनुच्छेद : 104. अनुच्छेद 99 के अधीन शपथ लेने या प्रतिज्ञान करने से पहले या अर्हित न होते हुए या निरर्हित किए जाने पर बैठने और मत देने के लिए शास्ति

सरल व्याख्या :अगर कोई व्यक्ति बिना शपथ लिए या अयोग्य घोषित होने के बावजूद संसद की बैठक में बैठता है या वोट डालता है, तो उसे हर दिन के हिसाब से ₹500 का जुर्माना (जुर्माना/शास्ति) देना होगा।

संसद और उसके सदस्यों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ – अनुच्छेद 105 और 106

 अनुच्छेद : 105. संसद के सदनों की तथा उनके सदस्यों और समितियों की शक्तियां एवं विशेषाधिकार आदि

सरल व्याख्या :सांसदों को कुछ विशेष छूट मिलती है। संसद के अंदर कही गई किसी भी बात या दिए गए वोट के लिए किसी भी सांसद पर कोर्ट में केस नहीं चलाया जा सकता।

 अनुच्छेद : 106. सदस्यों के वेतन और भत्ते

सरल व्याख्या :सांसदों को कितनी सैलरी, पेंशन और सरकारी भत्ते (Facilities) मिलेंगे, यह तय करने का अधिकार खुद संसद के पास है।

विधायी प्रक्रिया (Legislative Procedure) – अनुच्छेद 107 से 111

यह देश में नया कानून बनाने या बिल (विधेयक) पास करने का तरीका है।

 अनुच्छेद : 107. विधेयकों के पुरःस्थापन और पारित किए जाने के संबंध में उपबंध

सरल व्याख्या :कोई भी नया कानून बनाने के लिए बिल को संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। कानून तभी बनेगा जब दोनों सदन (लोकसभा और राज्यसभा) उसे पास कर दें।

संयुक्त बैठक (Joint Sitting)

 अनुच्छेद : 108. कुछ दशाओं में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक

सरल व्याख्या :अगर किसी साधारण बिल पर लोकसभा और राज्यसभा के बीच झगड़ा हो जाए और सहमति न बने, तो राष्ट्रपति दोनों सदनों के सांसदों को एक साथ बुलाकर ‘संयुक्त बैठक’ (Joint Sitting) करा सकते हैं।

 अनुच्छेद : 109. धन विधेयक के संबंध में विशेष प्रक्रिया

सरल व्याख्या :पैसों से जुड़े बिल (Money Bill) को राज्यसभा में पेश नहीं किया जा सकता। इसे सिर्फ लोकसभा में ही लाया जा सकता है, और राज्यसभा इसे केवल 14 दिनों तक ही रोक सकती है।

धन विधेयक की परिभाषा (Definition of Money Bill)

 अनुच्छेद : 110. "धन विधेयक" की परिभाषा

सरल व्याख्या :कौन सा बिल ‘धन विधेयक’ (Money Bill) होगा, यह इसमें तय है (जैसे टैक्स लगाना, सरकार द्वारा कर्ज लेना आदि)। कोई बिल धन विधेयक है या नहीं, इसका अंतिम फैसला लोकसभा का स्पीकर करता है।

विधेयकों पर अनुमति (Assent to Bills)

 अनुच्छेद : 111. विधेयकों पर अनुमति

सरल व्याख्या :जब दोनों सदन किसी बिल को पास कर देते हैं, तो वह राष्ट्रपति के पास जाता है। राष्ट्रपति के दस्तखत (अनुमति) के बाद ही वह देश का कानून बनता है।

वित्तीय विषयों के संबंध में प्रक्रिया (Financial Matters) – अनुच्छेद 112 से 117

यह देश के बजट और सरकारी पैसों के खर्च से जुड़ी प्रक्रिया है।

‘बजट’ (Budget)

 अनुच्छेद : 112. वार्षिक वित्तीय विवरण

सरल व्याख्या :इसे हम आम भाषा में देश का ‘बजट’ (Budget) कहते हैं। राष्ट्रपति हर साल सरकार की कमाई और खर्चे का पूरा हिसाब संसद के सामने रखवाएंगे।

 अनुच्छेद : 113. संसद में प्राक्कलनों के संबंध में प्रक्रिया

सरल व्याख्या :सरकार को काम चलाने के लिए जितने पैसों की जरूरत होती है, उसके लिए संसद में अनुदान की मांग (Demands for Grants) रखनी पड़ती है, जिस पर लोकसभा में वोटिंग होती है।

विनियोग विधेयक(Appropriation Bill)

 अनुच्छेद : 114. विनियोग विधेयक

सरल व्याख्या :इसे Appropriation Bill कहते हैं। सरकार भारत की संचित निधि (सरकारी खजाने) से एक भी रुपया तब तक नहीं निकाल सकती, जब तक संसद इस बिल को पास न कर दे।

अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान (Supplementary, additional or excess grants).

 अनुच्छेद : 115. अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान

सरल व्याख्या :अगर बजट में तय किए गए पैसे साल खत्म होने से पहले ही कम पड़ जाएं, या किसी नए काम के लिए अचानक और पैसों की जरूरत हो, तो सरकार संसद से अतिरिक्त पैसे (Supplementary Grants) मांग सकती है।

लेखानुदान, प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान (Votes on account, votes of credit and exceptional grants).

 अनुच्छेद : 116. लेखानुदान, प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान

सरल व्याख्या :अगर किसी वजह से (जैसे चुनाव के समय) पूरा बजट पास होने में समय लग रहा हो, तो सरकार कुछ महीनों का जरूरी खर्चा चलाने के लिए संसद से एडवांस में पैसे ले सकती है, जिसे ‘लेखानुदान’ (Vote on Account) कहते हैं।

वित्त विधेयकों (Financial Bills)

 अनुच्छेद : 117. वित्त विधेयकों के बारे में विशेष उपबंध

सरल व्याख्या :पैसों और टैक्स से जुड़े जो अन्य वित्तीय बिल (Financial Bills) होते हैं, उन्हें पेश करने के लिए राष्ट्रपति की पहले से मंजूरी लेना जरूरी होता है।

साधारण प्रक्रिया (General Procedure) – अनुच्छेद 118 से 122

 अनुच्छेद : 118. प्रक्रिया के नियम

सरल व्याख्या :लोकसभा और राज्यसभा अपने कामकाज को शांति और अनुशासन से चलाने के लिए अपने खुद के नियम (Rules) बना सकते हैं।

 अनुच्छेद : 119. संसद में वित्तीय कार्य संबंधी प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन

सरल व्याख्या :पैसों और बजट से जुड़े कामों को समय पर पूरा करने के लिए संसद कानून बनाकर अपनी गति और नियम तय कर सकती है।

 अनुच्छेद : 120. संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा

सरल व्याख्या :संसद का कामकाज हिंदी या अंग्रेजी भाषा में होगा। हालांकि, अगर कोई सांसद इन दोनों भाषाओं को नहीं जानता, तो सदन का अध्यक्ष उसे उसकी मातृभाषा (Local Language) में बोलने की छूट दे सकता है।

 अनुच्छेद : 121. संसद में चर्चा पर निबंधन

सरल व्याख्या :सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज अपने पद पर रहते हुए कैसा फैसला सुनाते हैं या क्या काम करते हैं, इस बात की बुराई या चर्चा संसद के अंदर नहीं की जा सकती (जब तक उन्हें हटाने का प्रस्ताव न चल रहा हो)।

 अनुच्छेद : 122. न्यायालयों द्वारा संसद की कार्यवाहियों की जांच न किया जाना

सरल व्याख्या :संसद के अंदर नियमों का पालन हुआ या नहीं, या वहाँ कैसे काम हुआ, इसकी जांच देश की कोई भी अदालत (कोर्ट) नहीं कर सकती। संसद अपने अंदर के मामलों के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

अध्याय 3. राष्ट्रपति की विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers of President)

राष्ट्रपति की अध्यादेश (Ordinance) जारी करने की शक्ति

यह राष्ट्रपति की आपातकालीन स्थिति में कानून बनाने की विशेष शक्ति के बारे में है।

अनुच्छेद 123: राष्ट्रपति की अध्यादेश (Ordinance) जारी करने की शक्ति

कब जारी होता है?: जब संसद के दोनों सदन (या कोई एक सदन) सत्र में न हों और राष्ट्रपति को लगे कि देश में तुरंत कानून बनाने की आपातकालीन स्थिति है.

महत्व: इस अध्यादेश की शक्ति संसद द्वारा बनाए गए कानून के बराबर ही होती है.

समय सीमा: संसद का सत्र दोबारा शुरू होने पर अध्यादेश को 6 सप्ताह के भीतर संसद से मंजूरी मिलना अनिवार्य है, अन्यथा यह समाप्त हो जाता है. (इसकी अधिकतम अवधि 6 महीने और 6 सप्ताह हो सकती है).


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