“इस लेख में हम भारत के विभिन्न स्थलों से प्राप्त गुप्तकालीन अभिलेख की पूरी सूची और उनके महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे।”
भारत के विभिन्न स्थलों से प्राप्त गुप्तकालीन अभिलेख For UPPCS,BPSC,MPPSC,HEO,SSC,RO ARO,LOWER PCS
1. बिलसद अभिलेख (Bilsad Inscription)
स्थान: एटा (उत्तर प्रदेश)
वर्ष / समय: 415 ईस्वी (गुप्त संवत 96)
शासक: कुमारगुप्त प्रथम (Kumaragupta I)
सरल व्याख्या: यह राजा कुमारगुप्त प्रथम के शासनकाल का पहला प्रामाणिक अभिलेख माना जाता है। इस गुप्तकालीन अभिलेख से हमें गुप्त राजाओं की वंशावली (उनके पूर्वजों के नाम) की जानकारी मिलती है। इसके अलावा, इसमें ध्रुव शर्मा नामक व्यक्ति द्वारा कार्तिकेय (भगवान शिव के पुत्र) के मंदिर और एक ऊंचे स्तंभ (लाट) बनवाए जाने का जिक्र है।
2. गढ़वा के अभिलेख (Garhwa Inscriptions)
स्थान: प्रयागराज (शंकरगढ़ के पास गढ़वा किला)
वर्ष / समय: 417 ईस्वी और 432 ईस्वी (शुरुआती 5वीं शताब्दी)
शासक: चंद्रगुप्त द्वितीय और कुमारगुप्त प्रथम
सरल व्याख्या: गढ़वा से गुप्तकालीन अभिलेख के कुल तीन शिलालेख मिले हैं। यह मुख्य रूप से दान (Charity) से जुड़े अभिलेख हैं। इनसे पता चलता है कि गुप्त राजाओं और उनके परिवार ने ‘सत्र’ (सदाव्रत या दीन-दुखियों के लिए मुफ्त भोजनालय/आश्रम) चलाने के लिए भारी मात्रा में सोने के सिक्के (दीनार) दान किए थे। इसमें पाटलिपुत्र शहर का भी उल्लेख है।
3. करमदण्डा अभिलेख (Karamdanda Inscription)
स्थान: फैजाबाद (वर्तमान अयोध्या जिला)
वर्ष / समय: 436 ईस्वी (गुप्त संवत 117)
शासक: कुमारगुप्त प्रथम
सरल व्याख्या: यह गुप्तकालीन अभिलेख एक शिवलिंग के निचले हिस्से पर खुदा हुआ मिला था। इसे कुमारगुप्त प्रथम के एक बहुत प्रसिद्ध मंत्री और सेनापति (महाबलाधिकृत) पृथ्वीषेण ने लगवाया था। इस अभिलेख की खास बात यह है कि इससे पता चलता है कि गुप्त काल में प्रशासनिक पद कभी-कभी वंशानुगत (पीढ़ी-दर-पीढ़ी) होते थे, क्योंकि पृथ्वीषेण के पिता शिखरस्वामी भी चंद्रगुप्त द्वितीय के मंत्री थे।
4. मनकुँवर अभिलेख (Mankuwar Inscription)
स्थान: प्रयागराज (यमुना नदी के तट के पास मनकुँवर)
वर्ष / समय: 448 ईस्वी (गुप्त संवत 129)
शासक: कुमारगुप्त प्रथम
सरल व्याख्या: यह गुप्तकालीन अभिलेख भगवान बुद्ध की एक बैठी हुई मूर्ति की चौकी (Pedestal) पर लिखा हुआ है। इसे ‘बुद्धमित्र’ नाम के एक बौद्ध भिक्षु द्वारा स्थापित किया गया था। खास बात यह है कि गुप्त राजा खुद ‘वैष्णव’ (हिंदू धर्म के अनुयायी) थे, लेकिन इस अभिलेख से सिद्ध होता है कि उनके राज्य में बौद्ध धर्म को भी पूरी स्वतंत्रता और सम्मान प्राप्त था (धार्मिक सहिष्णुता)।
5. मथुरा का शिलालेख (Mathura Inscription)
स्थान: मथुरा
वर्ष / समय: 380 ईस्वी (गुप्त संवत 61 के आसपास)
शासक: चंद्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’
सरल व्याख्या: यह गुप्तकालीन अभिलेख धार्मिक इतिहास के लिए बेहद जरूरी है। इसमें पहली बार गुप्त काल के दौरान शैव धर्म के ‘पाशुपत संप्रदाय’ का लिखित प्रमाण मिलता है। इसमें उदिताचार्य नामक एक शैव संत द्वारा दो शिव लिंगों (कपलेश्वर और उपमितेश्वर) की स्थापना का वर्णन है।
6. भीतरी स्तंभलेख (Bhitari Pillar Inscription)
स्थान: सैदपुर, गाजीपुर
वर्ष / समय: 455-467 ईस्वी के बीच (स्कंदगुप्त का काल)
शासक: स्कंदगुप्त (Skandagupta)
सरल व्याख्या: यह गुप्तकालीन अभिलेख भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभलेखों में से एक है। इससे पता चलता है कि जब विदेशी आक्रमणकारियों ‘हूणों’ (Hunas) ने भारत पर भयानक हमला किया, तो राजकुमार स्कंदगुप्त ने अकेले वीरता से लड़कर हूणों को बुरी तरह हरा दिया और गुप्त साम्राज्य की रक्षा की। इसमें स्कंदगुप्त द्वारा अपनी जीत की खुशी में भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करने की बात भी कही गई है।
7. कहौम स्तंभ लेख (Kahaum Pillar Inscription)
स्थान: सलेमपुर के पास कहौम, देवरिया (पूर्व में गोरखपुर जिला क्षेत्र)
वर्ष / समय: 460 ईस्वी (गुप्त संवत 141)
शासक: स्कंदगुप्त
सरल व्याख्या: यह गुप्तकालीन अभिलेख पूरी तरह से जैन धर्म को समर्पित एक पत्थर का स्तंभ (Pillar) है। इसे मद्र नामक एक आम नागरिक/भक्त द्वारा स्थापित कराया गया था। इस स्तंभ के शीर्ष पर जैन धर्म के 5 तीर्थंकरों (आदिनाथ, शांतिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और महावीर स्वामी) की नग्न मूर्तियां खुदी हुई हैं। यह दिखाता है कि गुप्त काल में आम जनता जैन धर्म का भी पालन करती थी।
8. प्रयाग प्रशस्ति (Prayag Prasasti / Allahabad Pillar Inscription)
स्थान: प्रयागराज (इलाहाबाद) किला, उत्तर प्रदेश
वर्ष / समय: लगभग 4वीं शताब्दी (335-375 ईस्वी के बीच)
शासक: समुद्रगुप्त (Samudragupta)
सरल व्याख्या: यह गुप्तकालीन अभिलेख गुप्त साम्राज्य के इतिहास को जानने का सबसे बड़ा और प्रामाणिक लिखित दस्तावेज है। इसकी रचना समुद्रगुप्त के दरबारी कवि और संधि-विग्रहिक (विदेश मंत्री) हरिषेण ने संस्कृत भाषा (चम्पू शैली) में की थी। इस लेख में सम्राट समुद्रगुप्त के पूरे जीवन, उनके महान चरित्र और उनके अद्वितीय सैन्य अभियानों (सैन्य विजय) का विस्तृत वर्णन है। इसमें बताया गया है कि कैसे उन्होंने उत्तर भारत (आर्यावर्त) के 9 राजाओं और दक्षिण भारत (दक्षिणापथ) के 12 राजाओं को हराकर अपने अधीन किया। उनकी इन्हीं लगातार जीतों और वीरता के कारण इतिहासकारों ने समुद्रगुप्त को ‘भारत का नेपोलियन’ कहा है।
9. एरण शिलालेख (Eran Stone Pillar Inscription)
स्थान: सागर जिला, मध्य प्रदेश
वर्ष / समय: 510 ईस्वी
शासक: भानुगुप्त (Bhanugupta)
सरल व्याख्या: यह गुप्तकालीन अभिलेख भारतीय इतिहास का एक बेहद क्रांतिकारी और महत्वपूर्ण अभिलेख है। इससे इतिहासकारों को पता चलता है कि राजा भानुगुप्त के मित्र और सेनापति ‘गोपराज’ हूणों के खिलाफ युद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए थे। उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने चिता पर बैठकर अपनी जान दे दी थी। यह पूरे भारतीय इतिहास में सती प्रथा (Sati System) का पहला लिखित पुरातात्विक साक्ष्य है।
10. महरौली लौह स्तंभ लेख (Mehrauli Iron Pillar Inscription)
स्थान: कुतुब मीनार परिसर, नई दिल्ली
वर्ष / समय: लगभग 4वीं-5वीं शताब्दी (लगभग 375-415 ईस्वी)
शासक: चंद्रगुप्त द्वितीय / विक्रमादित्य (Chandragupta II)
सरल व्याख्या: यह स्तंभ धातु विज्ञान (Metallurgy) का एक अद्भुत और वैज्ञानिक चमत्कार है। पिछले 1600 सालों से खुले आसमान के नीचे धूप-बारिश में रहने के बावजूद इस लोहे के खंभे पर आज तक जंग (Rust) नहीं लगी है। इस पर ‘चंद्र’ नामक राजा की विजय गाथा लिखी है, जिन्होंने बंगाल के शत्रुओं को हराया था। इतिहासकारों के अनुसार यह राजा चंद्रगुप्त द्वितीय ही थे।
11. मन्दसौर प्रशस्ति (Mandsaur Pillar Inscription)
स्थान: मंदसौर, मध्य प्रदेश
वर्ष / समय: 436-473 ईस्वी के बीच
शासक: कुमारगुप्त प्रथम (Kumargupta I)
सरल व्याख्या: इस गुप्तकालीन अभिलेख की रचना प्रसिद्ध कवि वत्सभट्टि ने की थी। यह लेख गुप्तकाल के समृद्ध व्यापार और अर्थव्यवस्था की कहानी बताता है। इसमें लिखा है कि गुजरात (लाट प्रदेश) से रेशम बुनकरों का एक पूरा संगठन (Guild/श्रेणी) मंदसौर आकर बस गया था। जब उनके व्यापार में खूब तरक्की हुई, तो उन्होंने अपनी कमाई से मिलकर यहाँ एक भव्य और ऐतिहासिक सूर्य मंदिर (Sun Temple) का निर्माण करवाया था।
12. जूनागढ़ अभिलेख (Junagadh Rock Inscription)
स्थान: जूनागढ़, गुजरात
वर्ष / समय: 455-456 ईस्वी के बीच
शासक: स्कंदगुप्त (Skandagupta)
सरल व्याख्या: यह गुप्तकालीन अभिलेख गुप्त राजाओं की प्रजा-कल्याण (Public Welfare) की नीति को दर्शाता है। इसमें लिखा है कि स्कंदगुप्त के समय बहुत भारी बारिश के कारण ऐतिहासिक सुदर्शन झील का बांध टूट गया था, जिससे चारों तरफ हाहाकार मच गया था। जनता को इस संकट से बचाने के लिए स्कंदगुप्त ने बिना समय गंवाए सरकारी खजाने से भारी धन दिया और अपने प्रांतीय गवर्नर के पुत्र ‘चक्रपालित’ की देखरेख में उस बांध का दोबारा मजबूती से निर्माण करवाया।
13. दामोदरपुर ताम्रपत्र लेख (Damodarpur Copper Plate Inscription)
स्थान: दीनाजपुर (आधुनिक बांग्लादेश)
वर्ष / समय: 5वीं शताब्दी (कुमारगुप्त प्रथम का काल)
शासक: कुमारगुप्त प्रथम (Kumargupta I)
सरल व्याख्या: तांबे की प्लेटों (ताम्रपत्र) पर लिखा यह गुप्तकालीन अभिलेख गुप्तकाल की प्रशासनिक और जमीन से जुड़ी व्यवस्था की जानकारी देता है। इससे पता चलता है कि उस ज़माने में ज़मीन की खरीद-बिक्री के कड़े नियम थे। यदि किसी को धार्मिक या व्यक्तिगत काम के लिए सरकारी ज़मीन खरीदनी होती थी, तो स्थानीय नगर अधिकारियों (जैसे नगर श्रेष्ठि और सार्थवाह) की गवाही और राज्य की अनुमति के बाद ही ज़मीन की रजिस्ट्री होती थी।
14. सुपिया का स्तंभ लेख (Supia Pillar Inscription)
स्थान: रीवा, मध्य प्रदेश
वर्ष / समय: 460 ईस्वी
शासक: स्कंदगुप्त (Skandagupta)
सरल व्याख्या: यह गुप्तकालीन अभिलेख इतिहास के नामकरण को समझने के लिए बहुत खास है। आम तौर पर हम इतिहास में इस वंश को ‘गुप्त वंश’ कहते हैं, लेकिन सुपिया के इस स्तंभ लेख में गुप्त राजाओं की वंशावली (Family Tree) घटोत्कच के नाम से शुरू की गई है और इस पूरे राजवंश को ‘घटोत्कच वंश’ के नाम से पुकारा गया है।
उत्तर प्रदेश से प्राप्त गुप्तकालीन अभिलेखों की Quick Summary Table (Ek Nazar Me Sab Kuch) नीचे दी गई है
| अभिलेख का नाम (Inscription Name) | प्राप्ति स्थल (UP का जिला) | मुख्य शासक (संबंधित राजा) | मुख्य विषय / विशेष तथ्य (Key Details) |
| बिलसद अभिलेख | Bilsad Ke Abhilekh | एटा | कुमारगुप्त प्रथम | कुमारगुप्त के शासनकाल की शुरुआती जानकारी और कार्तिकेय मंदिर का उल्लेख मिलता है। |
| गढ़वा के अभिलेख | Garhwa Ke Abhilekh | प्रयागराज | चंद्रगुप्त द्वितीय / कुमारगुप्त | इस स्थान से गुप्तकाल के कई शिलालेख मिले हैं, जो मुख्य रूप से धार्मिक दानों से संबंधित हैं। |
| करमदण्डा अभिलेख | Karamdanda Ke Abhilekh | फैजाबाद (अयोध्या) | कुमारगुप्त प्रथम | कुमारगुप्त के मंत्री पृथ्वीषेण द्वारा शिव प्रतिमा (शिवलिंग) की स्थापना का वर्णन है। |
| मनकुँवर अभिलेख | Mankuwar Ke Abhilekh | प्रयागराज | कुमारगुप्त प्रथम | इसमें बुद्ध की एक मूर्ति पर लेख खुदा है, जिससे गुप्तकालीन मूर्तिकला की जानकारी मिलती है। |
| मथुरा का शिलालेख | Mathura Ke Abhilekh | मथुरा | चंद्रगुप्त द्वितीय | यह गुप्त संवत (गुप्त कैलेंडर) की तिथि और शैव धर्म के संप्रदायों की जानकारी देता है। |
| भीतरी स्तंभलेख | Bhitari ka stambh lekh | गाजीपुर | स्कंदगुप्त | बेहद महत्वपूर्ण! इसमें स्कंदगुप्त द्वारा हूूणों (Hunas) को हराने का पूरा विवरण दर्ज है। |
| कहौम स्तंभ लेख | Kahaum Ke Abhilekh | गोरखपुर | स्कंदगुप्त | इसमें मद्र नाम के व्यक्ति द्वारा पांच जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों की स्थापना का उल्लेख है। |
भारत से के विभिन्न स्थलों से निम्नलिखित गुप्तकालीन अभिलेख प्राप्त हुए है
| अभिलेख का नाम (Inscription) | प्राप्ति स्थल (Location) | मुख्य शासक (Ruler) | मुख्य विषय / विशेष तथ्य (Key Details) |
| प्रयाग प्रशस्ति | Prayag Prasasti | प्रयागराज, उत्तर प्रदेश | समुद्रगुप्त | हरिषेण द्वारा रचित। समुद्रगुप्त की दिग्विजय नीतियों और सैनिक सफलताओं का विवरण। |
| एरण शिलालेख | Eran Abhilekh | सागर जिला, मध्य प्रदेश | भानुगुप्त | 510 ई. का यह लेख भारत में सती प्रथा (Sati System) का प्रथम लिखित पुरातात्विक साक्ष्य है। |
| महरौली लौह स्तंभ | mehrauli lauh stambh | नई दिल्ली | चंद्रगुप्त द्वितीय | बिना जंग लगे इस प्रसिद्ध धातु स्तंभ पर राजा ‘चंद्र’ की बंगाल विजयों का वर्णन है। |
| मन्दसौर प्रशस्ति | Mandsaur Prasasti | मंदसौर, मध्य प्रदेश | कुमारगुप्त प्रथम | इसमें रेशम बुनकरों की श्रेणी (Guild) द्वारा सूर्य मंदिर के निर्माण का उल्लेख है। |
| जूनागढ़ अभिलेख | Junagadh Ke Abhilekh | जूनागढ़, गुजरात | स्कंदगुप्त | भारी बारिश से सुदर्शन झील का बांध टूटने और स्कंदगुप्त द्वारा उसके पुनर्निर्माण का वर्णन। |
| दामोदरपुर ताम्रपत्र | Damodarpur Copper Plate | दीनाजपुर (अब बांग्लादेश) | कुमारगुप्त प्रथम | गुप्तकालीन प्रांतीय प्रशासनिक व्यवस्था और भूमि बिक्री के कड़े नियमों की जानकारी। |
| सुपिया का स्तंभ लेख | supia ka stambh lekh | रीवा, मध्य प्रदेश | स्कंदगुप्त | इस अभिलेख में गुप्त वंश को ‘घटोत्कच वंश’ के नाम से पुकारा गया है। |
भारत के विभिन्न स्थलों से प्राप्त प्रमुख गुप्तकालीन अभिलेखों (Gupta Inscriptions) की शासकवार और स्थानवार सम्पूर्ण सूची निम्नलिखित है:
1.समुद्रगुप्त के अभिलेख
प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद स्तंभ लेख): यह उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में स्थित है। इसके रचनाकार समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण थे, जिन्होंने इसकी रचना चम्पू काव्य शैली (संस्कृत) में की थी।
एरण शिलालेख: यह मध्य प्रदेश के सागर जिले के एरण से प्राप्त हुआ है, जिसमें समुद्रगुप्त की विजयों और उसकी पत्नी दत्तदेवी का उल्लेख है।
नालंदा ताम्रलेख: यह बिहार के नालंदा से प्राप्त हुआ है, जिससे समुद्रगुप्त के शासनकाल और भूमि अनुदान की जानकारी मिलती है।
गया ताम्रलेख: यह बिहार के गया से प्राप्त हुआ है, जिसमें समुद्रगुप्त को ‘परमभागवत’ कहा गया है।
2.चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) के अभिलेख
महरौली लौह स्तंभ लेख: यह दिल्ली में स्थित है। इस स्तंभ पर जंग न लगने वाली अनूठी धातु तकनीक का उपयोग किया गया है और इस पर ‘चन्द्र’ नामक राजा की विजयों का वर्णन है।
मथुरा शिलालेख: यह उत्तर प्रदेश के मथुरा से प्राप्त हुआ है, जिसमें पहली बार गुप्त संवत (Gupta Era) के उपयोग का लिखित प्रमाण मिलता है।
उदयगिरि गुहालेख: यह मध्य प्रदेश के विदिशा के पास उदयगिरि गुफाओं से प्राप्त हुआ है। इसके दो लेख हैं जो उनके मंत्रियों और धार्मिक दान से संबंधित हैं।
गढ़वा शिलालेख: यह उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) के गढ़वा नामक स्थान से मिला है, जो धार्मिक दान से संबंधित है।
सांची शिलालेख: यह मध्य प्रदेश के रायसेन (सांची) से प्राप्त हुआ है, जिसमें बौद्ध विहार को दिए गए दान का उल्लेख है।
3.कुमारगुप्त प्रथम के अभिलेख (सर्वाधिक अभिलेख इन्हीं के मिले हैं)
बिलसड़ स्तंभ लेख: यह उत्तर प्रदेश के एटा जिले से प्राप्त हुआ है, जिससे गुप्त राजाओं की वंशावली की जानकारी मिलती है।
मंदसौर प्रशस्ति: यह मध्य प्रदेश के मंदसौर से प्राप्त हुआ है। इसके रचनाकार वत्सभट्टि थे और इसमें रेशम बुनकरों की श्रेणी (Guild) द्वारा सूर्य मंदिर के निर्माण का उल्लेख है।
करमदंडा लिंग अभिलेख: यह उत्तर प्रदेश के अयोध्या (तत्कालीन फैजाबाद) से प्राप्त हुआ है।
मनकुँवर बुद्ध प्रतिमा लेख: यह उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से प्राप्त हुआ है, जिसमें बुद्ध की मूर्ति के निचले भाग पर यह लेख उत्कीर्ण है।
दामोदरपुर ताम्रपत्र: यह वर्तमान बांग्लादेश (तत्कालीन बंगाल) से मिला है, जिसमें गुप्तकालीन स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था और भूमि बिक्री के नियमों का वर्णन है।
बैग्राम ताम्रपत्र: यह भी बंगाल क्षेत्र से प्राप्त हुआ है जो भूमि अनुदान से संबंधित है।
तुमैन शिलालेख: यह मध्य प्रदेश के गुना जिले से मिला है, जिसमें कुमारगुप्त को शरद कालीन सूर्य की भांति बताया गया है।
4.स्कंदगुप्त के अभिलेख
भीतरी स्तंभ लेख: यह उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के भीतरी नामक स्थान से मिला है। इसमें स्कंदगुप्त द्वारा हूणों और पुष्यमित्रों को पराजित करने का अत्यंत महत्वपूर्ण विवरण है।
जूनागढ़ अभिलेख: यह गुजरात के सौराष्ट्र (जूनागढ़) से प्राप्त हुआ है। इसमें सुदर्शन झील के पुनरुद्धार और हूणों की पराजय का उल्लेख मिलता है।
कहौम स्तंभ लेख: यह उत्तर प्रदेश के गोरखपुर (देवरिया) से प्राप्त हुआ है, जो जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों की स्थापना से संबंधित है।
इन्दौर ताम्रपत्र: यह उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के इन्दौर नामक स्थान से मिला है, जिसमें देवविष्णु नामक ब्राह्मण द्वारा सूर्य मंदिर में दीपक जलाने के लिए धन दान देने का विवरण है।सुपिया का स्तंभ लेख: यह मध्य प्रदेश के रीवा से प्राप्त हुआ है, जिसमें गुप्त वंश को ‘घटोत्कच वंश’ कहा गया है।
5.भानुगुप्त का अभिलेख
एरण का सती अभिलेख (510 ईस्वी): यह मध्य प्रदेश के सागर जिले के एरण से प्राप्त हुआ है। भारतीय इतिहास में सती प्रथा का प्रथम लिखित पुरातात्विक साक्ष्य इसी अभिलेख से मिलता है, जिसमें भानुगुप्त के मित्र ‘गोपराज’ के युद्ध में मारे जाने पर उनकी पत्नी के सती होने का जिक्र है।
मुख्य विशेषताएं:
भाषा: इन सभी गुप्तकालीन अभिलेखों की मुख्य भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी (गुप्त लिपि) है।
प्रकार: ये अभिलेख मुख्य रूप से शिलाओं (पत्थरों), लौह व पाषाण स्तंभों और तांबे के पत्तरों (ताम्रपत्रों) पर लिखे गए हैं।
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