भारत शासन अधिनियम 1935 और इस पर प्रमुख कथन
इस लेख में हम भारत शासन अधिनियम 1935 और इस पर प्रमुख कथन के बारे में विस्तार से जानेंगे। यह अधिनियम भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण दस्तावेज था। हमारे वर्तमान भारतीय संविधान का लगभग 60 से 70 प्रतिशत हिस्सा इसी अधिनियम से लिया गया है। लेकिन, वास्तविक सत्ता भारतीयों को न मिलने के कारण तत्कालीन राष्ट्रीय नेताओं ने इस पर तीखी टिप्पणियां की थीं।
जवाहरलाल नेहरू का कथन
प्रश्न : वर्ष 1935 के अधिनियम के बारे में किसने कहा था कि "एक कार जिसमें ब्रेक तो हैं पर इंजन नहीं।"
उत्तर : जवाहरलाल नेहरू
सरल व्याख्या : पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस कानून का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि अंग्रेजों ने हमें एक ऐसी गाड़ी दे दी है जिसमें रोकने की ताकत (पाबंदियां और ब्रेक) तो बहुत ज्यादा हैं, लेकिन आगे बढ़ने या खुद फैसले लेने की असली ताकत (इंजन) बिल्कुल नहीं है।
प्रश्न : पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किस अधिनियम को "गुलामी का अधिकार पत्र या दासता का आज्ञा-पत्र" कहा था
उत्तर : भारत सरकार अधिनियम, 1935
सरल व्याख्या : नेहरू जी का मानना था कि यह कानून भारतीयों को आज़ादी देने के लिए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए गुलाम बनाए रखने (गुलामी का अधिकार पत्र) के कानूनी ढोंग के रूप में लाया गया था।
प्रश्न : पंडित जवाहरलाल नेहरू का सबसे प्रसिद्ध कथन क्या है, जिसमें उन्होंने 1935 के अधिनियम की तुलना एक गाड़ी से की थी?
उत्तर: नेहरू जी का प्रसिद्ध कथन था: “यह एक ऐसी कार (गाड़ी) है, जिसमें केवल ब्रेक हैं, लेकिन इंजन कोई नहीं है।”
सरल व्याख्या : इसका अर्थ यह था कि अंग्रेजों ने भारतीयों को मंत्रालय और सरकार चलाने का अधिकार तो दे दिया (यानी गाड़ी दे दी), लेकिन गवर्नरों को इतनी ज्यादा वीटो पावर्स दे दीं कि वे जब चाहें मंत्रियों के फैसले रोक सकते थे। बिना वास्तविक शक्ति (इंजन) के यह व्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती थी।
प्रश्न 3: “हमें अंदर से तो मजबूत बनाया जा रहा था, लेकिन बाहर से पूरी तरह जकड़ दिया गया था” भारत सरकार अधिनियम, 1935 के बारे में किसने कहा था कि
उत्तर :जवाहरलाल नेहरू
सरल व्याख्या : नेहरू जी का तात्पर्य ‘प्रांतीय स्वायत्तता’ से था। इस अधिनियम के द्वारा प्रांतों में भारतीय मंत्रियों को सरकार चलाने की छूट तो दी गई (अंदरूनी मजबूती का दिखावा), लेकिन अंतिम नियंत्रण, सेना, और वित्त व्यवस्था पर ब्रिटिश हुकूमत का ही कब्ज़ा रहा (बाहरी जकड़न)।
प्रश्न : इतने कड़े विरोध के बावजूद, जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस ने 1937 के प्रांतीय चुनावों में भाग क्यों लिया?
उत्तर :नेहरू जी और कांग्रेस का मानना था कि वे इस अधिनियम को स्वीकार नहीं करते हैं, लेकिन वे चुनाव लड़कर व्यवस्था के अंदर जाएंगे ताकि इस सड़े हुए कानून को अंदर से ही तोड़ सकें (To wreck the Act from within) और अंग्रेजों की नीतियों का पर्दाफाश कर सकें।
मोहम्मद अली जिन्ना का कथन
प्रश्न : मोहम्मद अली जिन्ना ने किस अधिनियम को “पूर्ण रूप से सड़ा हुआ, मूल रूप से बुरा और बिल्कुल अस्वीकार्य” कहा था?
उत्तर : भारत सरकार अधिनियम, 1935
सरल व्याख्या : जिन्ना का मानना था कि यह कानून बुनियादी रूप से बेहद खराब था। वे इसके ‘अखिल भारतीय संघ’ वाले हिस्से के सख्त खिलाफ थे, क्योंकि उन्हें डर था कि केंद्र में हिंदू बहुसंख्यकों के आने से मुस्लिम अल्पसंख्यकों के राजनीतिक अधिकार पूरी तरह खत्म हो जाएंगे।
पंडित मदन मोहन मालवीय का कथन
प्रश्न : किस भारतीय नेता ने 1935 के अधिनियम के बारे में कहा था कि “यह अधिनियम बाहर से देखने में लोकतांत्रिक लगता है, लेकिन अंदर से पूरी तरह खोखला है”?
उत्तर : पंडित मदन मोहन मालवीय
सरल व्याख्या : मालवीय जी का मानना था कि यह कानून केवल लोकतंत्र का दिखावा (मुखौटा) था। अंग्रेजों ने भारतीयों को चुनाव लड़ने और सरकार बनाने का हक तो दिया, लेकिन असली ताकत (पैसा, सेना और कानून बदलने का अधिकार) अपने ही पास रखी, जिससे यह व्यवस्था अंदर से बिल्कुल खाली थी।
सी. राजगोपालाचारी का कथन
प्रश्न : किस भारतीय स्वतंत्रता सेनानी ने 1935 के भारत शासन अधिनियम को “द्वैध शासन (Diarchy) से भी बदतर” कहा था?
उत्तर : सी. राजगोपालाचारी
सरल व्याख्या : राजगोपालाचारी का मानना था कि यह कानून पुरानी शासन व्यवस्था (1919 के एक्ट) से भी ज्यादा खराब था। इसमें जनता को दिखाने के लिए तो बड़ी-बड़ी बातें की गई थीं, लेकिन असलियत में भारतीयों को पहले से भी कम और कमजोर अधिकार दिए गए थे।
प्रो. के. टी. शाह का कथन
प्रश्न : किस विद्वान ने 1935 के अधिनियम की आलोचना करते हुए कहा था कि “यह अधिनियम केवल प्रांतीय स्वायत्तता का नाटक है, जिसने गवर्नर-जनरल और गवर्नरों को तानाशाह बना दिया है”?
उत्तर : प्रो. के. टी. शाह
सरल व्याख्या : के. टी. शाह का कहना था कि यह कानून भारतीयों को अधिकार देने के नाम पर एक नाटक था। इस कानून ने असल में जनता द्वारा चुने गए मंत्रियों की ताकत बढ़ाने के बजाय, ब्रिटिश गवर्नर-जनरल और गवर्नरों को इतनी असीमित शक्तियां (वीटो पावर) दे दीं कि वे राजाओं की तरह तानाशाह बन गए।
महात्मा गांधी का कथन
प्रश्न : महात्मा गांधी ने 1935 के अधिनियम के तहत मिलने वाली ‘प्रांतीय स्वायत्तता’ (प्रांतों की आजादी) की तुलना किस चीज़ से की थी?
उत्तर : उन्होंने इसकी तुलना “एक ऐसी शादी से की थी जिसमें दूल्हा गायब हो”।
सरल व्याख्या : गांधी जी का मानना था कि अंग्रेजों ने प्रांतों में सरकार चलाने की आजादी (स्वायत्तता) का ढोल तो खूब पीटा, लेकिन इस आजादी की जो मुख्य आत्मा या असली ताकत (जैसे- वित्त व्यवस्था और अंतिम फैसले का अधिकार) होनी चाहिए थी, उसे गायब ही कर दिया।
सुभाष चंद्र बोस का कथन
प्रश्न : किस महान क्रांतिकारी नेता ने 1935 के अधिनियम का विरोध करते हुए कहा था कि “यह अधिनियम हमारे राष्ट्रीय गौरव पर चोट है और इसका उद्देश्य भारतीय स्वतंत्रता के आंदोलन को कुचलना है”?
उत्तर : नेताजी सुभाष चंद्र बोस
सरल व्याख्या : सुभाष चंद्र बोस का मानना था कि यह अधिनियम भारत को आज़ादी देने की अंग्रेजों की कोई ईमानदारी भरी कोशिश नहीं थी। बल्कि, यह भारतीयों को प्रांतीय सरकारों के लालच में फंसाकर, उनके भीतर की क्रांतिकारी भावना और पूर्ण स्वतंत्रता (पूर्ण स्वराज) की मांग को धीमा करने की एक सोची-समझी ब्रिटिश चाल थी।
प्रश्न : "1919 का अधिनियम "भारतीयों के लिए बेड़ियों का नया जाल था।" यह कथन था
उत्तर : सुभाषचन्द्र बोस का
सरल व्याख्या : नेताजी सुभाष चंद्र बोस का कहना था कि 1919 का मोंटेग्यू सुधार कानून आज़ादी के नाम पर भारतीयों को और ज्यादा कानूनी बंधनों में जकड़ने का अंग्रेजों का एक नया जाल था।
लॉर्ड एटली का कथन (ब्रिटिश नेता, जो बाद में ब्रिटेन के पीएम बने)
प्रश्न : किस ब्रिटिश नेता ने 1935 के अधिनियम की आलोचना करते हुए कहा था कि “इसमें भारत को डोमिनियन स्टेटस (औपनिवेशिक स्वराज) देने का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है”?
उत्तर : लॉर्ड एटली
सरल व्याख्या : एटली का मानना था कि इस भारी-भरकम कानून की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि इसमें भारतीयों की सबसे मुख्य मांग— ‘स्वराज’ (खुद का राज)—का कोई पक्का वादा या जिक्र नहीं किया गया था, जिसके कारण भारतीय नेता इससे कभी संतुष्ट नहीं हो सकते थे।
प्रश्न : किस वायसराय ने कहा था कि "भारत शासन अधिनियम, 1935 इसलिए पास किया गया, क्योंकि हम समझते थे कि भारत पर अंग्रेजी प्रभुत्व बरकरार रखने का यह सर्वोत्तम तरीका है।"
उत्तर : लॉर्ड लिनलिथगो
सरल व्याख्या : उस समय के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने अंग्रेजों की असली चालाकी को कबूल करते हुए कहा था कि यह कानून भारतीयों की भलाई के लिए नहीं, बल्कि भारत देश पर अंग्रेजों का कब्ज़ा (अंग्रेजी प्रभुत्व) हमेशा के लिए पक्का रखने का सबसे बढ़िया और सुरक्षित तरीका था।
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