भारत शासन अधिनियम, 1935 की मुख्य विशेषताएं,धाराएं,प्रभाव
यह हमारे आज के भारतीय संविधान का सबसे बड़ा स्रोत (हार्ट) है। हमारा आधा से ज्यादा संविधान इसी कानून की लाइनों से मिलकर बना है।
प्रश्न : भारत में उत्तरदायित्वपूर्ण शासन की स्थापना के संदर्भ में अंतिम महत्वपूर्ण अधिनियम कौन-सा था
उत्तर : भारत सरकार अधिनियम, 1935
सरल व्याख्या : आज़ादी से पहले अंग्रेजों द्वारा भारत में एक पूरी तरह जवाबदेह और ज़िम्मेदार सरकार (उत्तरदायित्वपूर्ण शासन) बनाने के नाम पर लाया गया यह सबसे आख़िरी और सबसे बड़ा कानून था।
प्रश्न : ब्रिटिश संसद ने भारत शासन अधिनियम, 1935 कब पारित किया था
उत्तर : अगस्त 1915 में (नोट: यह यहाँ मिसप्रिंट है, सही वर्ष 1935 है)
सरल व्याख्या : ब्रिटेन की संसद ने इस विशाल और ऐतिहासिक कानून को अगस्त 1935 में पास (पारित) किया था।
प्रश्न : भारत शासन अधिनियम, 1935 की प्रमुख विशेषता क्या है
उत्तर : भारत में सर्वप्रथम संघात्मक सरकार की स्थापना, प्रांतों में स्वायत्त शासन की स्थापना, केन्द्र में 'द्वैध शासन'
सरल व्याख्या : इस कानून में तीन सबसे बड़े ऐतिहासिक बदलाव किए गए थे—पहला, पूरे देश को मिलाकर एक मिले-जुले संघ (संघात्मक सरकार) की नींव रखी गई; दूसरा, राज्यों से ब्रिटिश अफसरों का राज हटाकर पूरी तरह आज़ाद सरकार (प्रांतों में स्वायत्त शासन / Provincial Autonomy) बनाई गई; और तीसरा, राज्यों का जो फेल दोहोरा शासन (द्वैध शासन) था, उसे वहां से हटाकर दिल्ली (केंद्र) में लागू कर दिया गया।
भारत शासन अधिनियम, 1935की पृष्ठभूमि (Background)
यह मुख्य रूप से भारत को एक संघ (Union) बनाने के प्रयासों और शक्तियों को तीन सूचियों में बांटने के नियमों को बताता है।
ब्रिटिश सरकार द्वारा Government of India Act 1935 को लाने के पीछे मुख्य कारण साइमन कमीशन(1927) की रिपोर्ट और तीन गोलमेज सम्मेलनों (1930-32) (Round Table Conferences) की विफलता थी।
प्रश्न : किस अधिनियम द्वारा भारत को लिखित संविधान देने का प्रयास किया गया था
उत्तर : भारत शासन अधिनियम, 1935 द्वारा
सरल व्याख्या : हालांकि यह पूरी तरह भारत का अपना संविधान नहीं था, लेकिन यह अंग्रेजों द्वारा बनाया गया अब तक का सबसे बड़ा और पहला ऐसा कानूनी दस्तावेज था जो एक लिखित संविधान की तरह ही काम करता था।
प्रश्न : भारत शासन अधिनियम, 1935 में ब्रिटिश भारत से संबंधित कुल अनुच्छेद तथा अनुसूचियां थीं
उत्तर : 321 अनुच्छेद तथा 10 अनुसूचियां
सरल व्याख्या : यह कानून इतना बड़ा और भारी-भरकम था कि इसमें कुल 321 धाराएं (अनुच्छेद) और 10 सूचियां (अनुसूचियां) शामिल थीं। हमारा आज का संविधान भी काफी हद तक इसी के ढांचे पर बना है।
प्रश्न : भारत शासन अधिनियम, 1935 के अंतर्गत अवशिष्ट शक्तियाँ केन्द्रित थीं
उत्तर : गवर्नर जनरल (वायसराय) में
सरल व्याख्या : ऐसे नए विषय जो किसी भी सूची में नहीं लिखे गए थे (जैसे भविष्य में आने वाली नई तकनीकें या समस्याएं), उन पर कानून बनाने या फैसला लेने का अंतिम अधिकार वायसराय (गवर्नर जनरल) को दिया गया था।
भारत शासन अधिनियम, 1935 की मुख्य विशेषताएं
1.अखिल भारतीय संघ की स्थापना (All India Federation)
प्रश्न : किस अधिनियम के द्वारा अंग्रेजों ने 'अखिल भारतीय संघ' शब्द प्रस्तावित किया था
उत्तर : भारत सरकार अधिनियम, 1935
सरल व्याख्या : अंग्रेजों ने पहली बार ब्रिटिश राज वाले राज्यों और राजा-महाराजाओं की रियासतों को मिलाकर एक बड़ा संयुक्त भारत यानी ‘अखिल भारतीय संघ’ (All India Federation) बनाने का कानूनी प्रस्ताव इसी एक्ट में रखा था।
प्रश्न : किस अधिनियम के द्वारा संघीय न्यायालय की स्थापना का प्रावधान किया गया था
उत्तर : भारत शासन अधिनियम, 1935 द्वारा
सरल व्याख्या : इसी कानून के तहत दिल्ली में भारत का पहला ‘संघीय न्यायालय’ (Federal Court) बनाने का नियम आया था (जो आगे चलकर 1937 में बना और यही आज हमारा सुप्रीम कोर्ट है)।
प्रश्न : वह अधिनियम जिसके द्वारा भारत में संघात्मक सरकार स्थापित की गयी थी
उत्तर : भारत शासन अधिनियम, 1935
सरल व्याख्या : जैसा कि ऊपर बताया गया, पूरे देश में केंद्र और राज्यों के बीच मिलकर काम करने वाली व्यवस्था यानी संघात्मक सरकार की कानूनी नींव इसी एक्ट से रखी गई थी।
प्रश्न : 1935 के अधिनियम में अखिल भारतीय संघ में सम्मिलित होना किसके लिए अनिवार्य था
उत्तर : ब्रिटिश भारतीय प्रांतों का
सरल व्याख्या : अंग्रेजों के सीधे कब्जे वाले जो राज्य (ब्रिटिश प्रांत) थे, उनके लिए इस नए भारतीय संघ में शामिल होना कानूनी रूप से एकदम ज़रूरी (अनिवार्य) कर दिया गया था।
प्रश्न : 1935 के अधिनियम में अखिल भारतीय संघ में सम्मिलित होना ऐच्छिक था
उत्तर : भारतीय राजाओं के लिए
सरल व्याख्या : जो राजा-महाराजाओं की अपनी रियासतें थीं, उन्हें अंग्रेजों ने पूरी छूट दी थी कि वे अपनी मर्जी से (ऐच्छिक) इस संघ में शामिल होना चाहें तो हों, वरना अलग रहें (इसी छूट की वजह से यह संघ कभी असलियत में बन ही नहीं पाया)।
प्रश्न : भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अधीन संघ में सम्मिलित होने वाली सभी रियासतों के शासक के लिए अनिवार्य था
उत्तर : अंगीकरण (विलय) पत्र पर हस्ताक्षर करना
सरल व्याख्या : यदि कोई राजा अपनी मर्जी से इस भारतीय संघ में शामिल होना चाहता था, तो उसके लिए एक सरकारी कानूनी कागज यानी विलय पत्र (Instrument of Accession) पर दस्तखत (हस्ताक्षर) करना ज़रूरी था।
प्रश्न : भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अनुसार गवर्नर जनरल (वायसराय) की नियुक्ति की गयी थी
उत्तर : ब्रिटिश सम्राट के प्रतिनिधि के रूप में, संघीय शक्तियों के प्रयोगकर्ता अधिकारी के रूप में
सरल व्याख्या : वायसराय को देश का सबसे बड़ा अधिकारी बनाया गया था जो ब्रिटेन के राजा (ब्रिटिश सम्राट) के सीधे दूत के रूप में काम करता था और केंद्र सरकार की सभी ताकतों (संघीय शक्तियों) का इस्तेमाल करता था।
2.शक्तियों का विभाजन (तीन सूचियां: संघ, प्रांत और समवर्ती सूची)
प्रश्न : भारत शासन अधिनियम, 1935 में विषयों को विभाजित किया गया था
उत्तर : संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची में
सरल व्याख्या : शासन के सभी कामों और विभागों को तीन अलग-अलग सूचियों (सूचियों) में साफ-साफ बांट दिया गया था, ताकि केंद्र और राज्यों के बीच कोई झगड़ा न हो।
प्रश्न : भारत शासन अधिनियम, 1935 के अंतर्गत केंद्रीय तथा प्रांतीय सरकारों के मध्य वैधानिक शक्तियों के विभाजन हेतु कितनी सूचियां बनायी गयी थीं
उत्तर : तीन संघीय सूची (59 विषय), प्रान्तीय सूची (54 विषय) तथा समवर्ती सूची (36 विषय)
सरल व्याख्या : कानून बनाने की ताकतों को तीन हिस्सों में बांटा गया था—संघीय सूची (59 काम जिन पर सिर्फ केंद्र कानून बनाएगा), प्रान्तीय सूची (54 काम जिन पर सिर्फ राज्य कानून बनाएंगे), और समवर्ती सूची (36 काम जिन पर केंद्र और राज्य दोनों मिलकर कानून बना सकते थे)।
प्रश्न : 1935 के अधिनियम के अंतर्गत संघीय सूची में रखे गये प्रमुख विषय थे
उत्तर : सशस्त्र सेनाएं, डाकतार, मुद्रा, रेल, विदेशी मामले, अखिल भारतीय सेवाएं आदि
सरल व्याख्या : केंद्र सरकार (संघीय सूची) के पास देश की सुरक्षा और मुख्य बड़े विभाग रखे गए थे—जैसे सेना, पोस्ट ऑफिस (डाकतार), देश का पैसा और नोट छापना (मुद्रा), ट्रेनें (रेल), विदेश नीति (विदेशी मामले), और बड़े सरकारी अफ़सरों की नौकरियां।
प्रश्न : भारत शासन अधिनियम, 1935 के अंतर्गत किसी भी सूची में उल्लिखित नहीं किये गये विषय के संदर्भ में विधि-निर्माण का अधिकार किसे दिया गया
उत्तर : गवर्नर जनरल के आदेश से केन्द्रीय अथवा प्रान्तीय विधान सभाओं को
सरल व्याख्या : यदि कोई ऐसा नया विषय सामने आता है जो किसी भी लिस्ट में नहीं लिखा है, तो वायसराय (गवर्नर जनरल) खुद यह तय करके आदेश दे सकता था कि उस पर कानून केंद्र की संसद बनाएगी या राज्यों की विधानसभा।
3.केंद्र में द्वैध शासन प्रणाली (Diarchy at the Centre)
यह केंद्र में लागू किए गए द्वैध शासन (आरक्षित और हस्तांतरित विषय), केंद्रीय संसद की संरचना और राज्यों (प्रांतों) की शासन व्यवस्था के बारे में बताता है।
प्रश्न : भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत केन्द्रीय कार्यपालिका के आरक्षित विषयों का प्रशासन किया जाता था
उत्तर : गवर्नर जनरल (वायसराय) तथा उसकी 3 सदस्यी परिषद द्वारा
सरल व्याख्या : केंद्र सरकार के सबसे मुख्य और संवेदनशील विभाग (जैसे—रक्षा, विदेश नीति, धार्मिक मामले) ‘आरक्षित विषय’ कहलाते थे। इन पर वायसराय भारतीय मंत्रियों की बात नहीं सुनता था, वह सिर्फ अपने खास 3 ब्रिटिश अफसरों की टीम (परिषद) के साथ मिलकर राज चलाता था।
प्रश्न : 1935 के अधिनियम के अनुसार केन्द्रीय कार्यपालिका के हस्तान्तरित विषयों का प्रशासन किया जाता था
उत्तर : गवर्नर जनरल तथा उसके मंत्रिमण्डल द्वारा
सरल व्याख्या : कम महत्वपूर्ण या सामान्य विभाग (जैसे—शिक्षा, स्वास्थ्य) ‘हस्तांतरित विषय’ कहलाते थे। इनका राज-काज वायसराय चुनाव जीतकर आए भारतीय नेताओं की टीम यानी मंत्रिमंडल की सलाह से संभालता था।
प्रश्न : भारत सरकार अधिनियम, 1935 में मंत्रिमण्डल की बैठकों की अध्यक्षता का अधिकार किसे प्रदान किया गया था
उत्तर : गवर्नर जनरल (वायसराय) को
सरल व्याख्या : भारतीय मंत्रियों की टीम (मंत्रिमंडल) की जब भी कोई मुख्य मीटिंग या बैठक होती थी, तो उसका मुख्य अध्यक्ष हमेशा वायसराय (गवर्नर जनरल) ही होता था।
प्रश्न : भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अनुसार, केन्द्रीय कार्यपालिका के आरक्षित विषयों के संदर्भ में गवर्नर जनरल किसके अधीन था
उत्तर : भारत सचिव के
सरल व्याख्या : मुख्य आरक्षित विभागों (जैसे सेना) के मामलों में वायसराय पूरी तरह आज़ाद नहीं था, उसे ब्रिटेन में बैठे ब्रिटिश मंत्री यानी भारत सचिव (Secretary of State) के नीचे (अधीन) रहकर उसके आदेशों का पालन करना पड़ता था।
प्रश्न : 1935 के अधिनियम के अनुसार, केन्द्रीय मंत्रिमण्डल के सदस्यों की नियुक्ति तथा पदच्युति, केन्द्रीय विधानसभा का सत्र आहूत करना, विधेयकों पर स्वीकृति की घोषणा करने का अधिकार था
उत्तर : गवर्नर जनरल के पास
सरल व्याख्या : वायसराय को बहुत ज्यादा ताकतें दी गई थीं। किसी मंत्री को चुनना हो या नौकरी से निकालना (पदच्युत), संसद की बैठक बुलाना (सत्र आहूत करना) हो, या किसी बिल को पास (स्वीकृति) करना हो, यह सारे मुख्य अधिकार सिर्फ वायसराय के पास थे।
प्रश्न : भारत शासन अधिनियम, 1935 के अधीन संघीय विधानमण्डल (व्यवस्थापिका) सदनीय थी
उत्तर : द्विसदनीय
सरल व्याख्या : केंद्र के स्तर पर देश के लिए कानून बनाने वाली मुख्य संसद को दो सदनों वाला (द्विसदनीय) बनाया गया था (जैसे आज हमारी लोकसभा और राज्यसभा होती हैं)।
प्रश्न : 1935 के अधिनियम के अंतर्गत संघीय विधानमण्डल (केंद्रीय विधानसभा) के सदनों में प्रावधानित सदस्य संख्या थी
उत्तर : उच्च सदन में 260 तथा निम्न सदन में 375 सदस्य
सरल व्याख्या : संसद के दोनों सदनों की सीटें तय की गई थीं—ऊपरी सदन (राज्य परिषद/उच्च सदन) में कुल 260 सदस्य और निचले सदन (केंद्रीय विधानसभा/निम्न सदन) में कुल 375 सदस्य बैठ सकते थे।
प्रश्न : भारत सरकार अधिनियम, 1935 में निम्न सदन का कार्यकाल निर्धारित किया गया था
उत्तर : पांच वर्ष
सरल व्याख्या : संसद के निचले सदन (निम्न सदन/लोकसभा जैसी सभा) के काम करने का समय या कार्यकाल कुल 5 साल का तय किया गया था (आज भी यही व्यवस्था है)।
प्रश्न : भारत सचिव के लिए अधिकतम 6 तथा न्यूनतम 3 परामर्शदाता नियुक्ति करने का प्रावधान किस अधिनियम के तहत किया गया था
उत्तर : भारत सरकार अधिनियम, 1935
सरल व्याख्या : ब्रिटेन में बैठे भारत सचिव की पुरानी 15 सदस्यों वाली बड़ी परिषद को खत्म कर दिया गया। उसकी जगह उसे सलाह देने के लिए कम से कम 3 और ज़्यादा से ज़्यादा 6 सलाहकार (परामर्शदाता) रखने का नया नियम बना।
प्रश्न : भारत शासन अधिनियम, 1935 में संशोधन अथवा परिवर्तन की शक्ति निहित थी
उत्तर : ब्रिटिश संसद को
सरल व्याख्या : इस 1935 के कानून में अगर कोई भी नया बदलाव या सुधार (संशोधन) करना हो, तो उसकी पूरी ताकत सिर्फ और सिर्फ इंग्लैंड की ब्रिटिश संसद के पास ही रखी गई थी। भारतीय नेता इसमें कोई बदलाव नहीं कर सकते थे।
प्रश्न : 1935 के अधिनियम के अधीन प्रान्तीय क्षेत्र के प्रशासन का नियंत्रण किसे दिया गया था
उत्तर : मंत्रिमण्डल को
सरल व्याख्या : यह राज्यों के लिए बहुत अच्छी बात थी। राज्यों (प्रांतों) का पूरा राज-काज और प्रशासनिक कंट्रोल अब पूरी तरह से भारतीय मंत्रियों की टीम यानी मंत्रिमंडल को सौंप दिया गया था (इसे ही प्रांतीय स्वायत्तता कहते हैं)।
प्रश्न : 1935 के अधिनियम में मंत्रिमण्डल को किसके प्रति उत्तरदायी घोषित किया गया था
उत्तर : विधानसभा के प्रति
सरल व्याख्या : राज्यों के भारतीय मंत्रियों को अपने हर काम और फैसले के लिए वहां की विधानसभा (जनता के प्रतिनिधियों) के सामने जवाबदेह या उत्तरदायी बनाया गया था। अगर वे ठीक से काम नहीं करते, तो विधानसभा उन्हें हटा सकती थी।
प्रश्न : 1935 के अधिनियम के तहत प्रान्तीय विधानसभा के कार्य संचालन सम्बन्धी नियमों का निर्माण करता था
उत्तर : गवर्नर
सरल व्याख्या : भले ही राज्यों में मंत्रियों का राज था, लेकिन राज्य की विधानसभा के अंदर कामकाज कैसे चलेगा और अनुशासन के नियम क्या होंगे, यह तय करने की मुख्य ताकत उस राज्य के गवर्नर के पास ही थी।
प्रश्न : 1935 के अधिनियम के अनुसार प्रान्तीय विधान सभा में अनुदान मांग रखने हेतु किसकी अनुमति आवश्यक थी
उत्तर : गवर्नर की
सरल व्याख्या : राज्य सरकार को बजट में अलग-अलग विभागों के लिए जो पैसों की ज़रूरत होती थी (अनुदान मांग), उसे विधानसभा के सामने रखने से पहले उस राज्य के गवर्नर की लिखित मंजूरी (अनुमति) लेना एकदम ज़रूरी था।
भारत शासन अधिनियम, 1935 (राज्यों में दो सदन और निर्देश प्रपत्र)
प्रश्न : 1935 के अधिनियम के द्वारा किन प्रान्तों में द्विसदनीय विधानमण्डल की व्यवस्था की गयी थी
उत्तर : बंगाल, बिहार, असम, बम्बई, मद्रास तथा संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश)
सरल व्याख्या : जैसे आज कुछ राज्यों में विधानसभा और विधान परिषद दोनों होती हैं, वैसे ही इस कानून के तहत भारत के कुल 6 बड़े राज्यों (प्रांतों) में दो सदनों वाली विधानसभा (द्विसदनीय विधानमंडल) की शुरुआत की गई थी।
प्रश्न : भारत सरकार अधिनियम, 1935 में अन्तर्निहित 'अनुदेश-प्रपत्र' (इन्स्ट्रूमेंट ऑफ इन्स्ट्रक्शन्स) को भारत के संविधान में किस रूप में समाविष्ट किया गया है
उत्तर : राज्य के नीति निदेशक तत्वों के रूप में
सरल व्याख्या : 1935 के कानून में अंग्रेजों ने गवर्नरों के लिए कुछ जरूरी दिशा-निर्देश लिखे थे जिसे ‘अनुदेश-प्रपत्र’ कहा जाता था। जब हमारा अपना नया संविधान बना, तो इन्हीं निर्देशों को बदलकर ‘राज्य के नीति निदेशक तत्व’ (Directive Principles – भाग-4) के रूप में शामिल (समाविष्ट) कर लिया गया, जो आज हमारी सरकारों को काम करने की सही दिशा दिखाते हैं।
प्रश्न : 1935 के अधिनियम के अनुसार, केंद्रीय विधायिका के दोनों सदनों में किसी विधेयक के संदर्भ में मतभेद की स्थिति में उसे सुलझाने के लिए किसके द्वारा दोनों सदनों का संयुक्त सत्र आहूत किया जा सकता था
उत्तर : गवर्नर जनरल (वायसराय)
सरल व्याख्या : अगर केंद्र की संसद के दोनों सदनों (उच्च सदन और निम्न सदन) के बीच किसी नए कानून या बिल (विधेयक) को लेकर कोई झगड़ा या असहमति (मतभेद) हो जाए, तो दोनों सदनों के नेताओं को एक साथ बिठाकर मीटिंग कराने यानी संयुक्त सत्र (Joint Sitting) बुलाने की ताकत वायसराय के पास थी।
संघीय न्यायालय (Federal Court) की स्थापना
प्रश्न : 1935 के अधिनियम के अधीन संघ तथा इसमें सम्मिलित इकाईयों के मध्य सांविधानिक विवादों के निपटारे हेतु किस न्यायालय की स्थापना की गयी थी
उत्तर : फेडरल न्यायालय (संघीय न्यायालय) दिल्ली
सरल व्याख्या : यदि केंद्र सरकार (संघ) और किसी राज्य सरकार (इकाई) के बीच कानून या बॉर्डर को लेकर कोई बड़ा झगड़ा (सांविधानिक विवाद) हो जाए, तो उसका निष्पक्ष फैसला करने के लिए दिल्ली में ‘फेडरल न्यायालय’ बनाया गया था।
प्रश्न : संघ सरकार द्वारा राज्यों को आदेश देने का विचार भारत के संविधान निर्माताओं ने किस अधिनियम से प्राप्त किया
उत्तर : 1935 के भारतीय अधिनियम से
सरल व्याख्या : हमारे आज के संविधान में केंद्र सरकार को यह ताकत मिली है कि वह किसी विशेष संकट के समय राज्य सरकारों को सीधे काम करने का हुक्म या ऑर्डर दे सके। यह खास आइडिया या विचार हमारे संविधान बनाने वालों ने इसी 1935 के कानून से लिया था।
प्रश्न : 1935 के अधिनियम द्वारा स्थापित होने वाले फेडरल न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या थी
उत्तर : एक मुख्य न्यायाधीश तथा छः अन्य न्यायाधीश
सरल व्याख्या : दिल्ली में बने इस पहले संघीय न्यायालय (फेडरल कोर्ट) में केसों की सुनवाई करने के लिए कुल 7 जज तय किए गए थे—जिसमें एक सबसे बड़ा जज (मुख्य न्यायाधीश) होता था और उसकी मदद के लिए 6 अन्य जज बैठते थे।
प्रश्न : 1935 के अधिनियम के अंतर्गत स्थापित फेडरल न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति किसके द्वारा की जानी थी
उत्तर : ब्रिटिश सम्राट द्वारा
सरल व्याख्या : इस बड़े फेडरल कोर्ट के जजों को चुनने या नियुक्त करने का पूरा अधिकार सीधे इंग्लैंड के राजा या रानी (ब्रिटिश सम्राट) के पास होता था।
प्रश्न : 1935 के अधिनियम के अधीन स्थापित फेडरल न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु निर्धारित की गयी थी
उत्तर : 65 वर्ष
सरल व्याख्या : इस कोर्ट के जज अपने पद पर रहकर अधिकतम 65 वर्ष की उम्र (सेवानिवृत्ति की आयु) तक ही काम संभाल सकते थे (आज हमारे सुप्रीम कोर्ट के जजों के लिए भी यही उम्र तय है)।
प्रश्न : 1935 के अधिनियम द्वारा स्थापित फेडरल न्यायालय को प्राप्त अधिकारिता थी
उत्तर : प्रारंभिक, अपीलीय तथा परामर्शदात्री अधिकारिता
सरल व्याख्या : इस कोर्ट के पास तीन मुख्य ताकतें थीं—प्रारंभिक (केंद्र-राज्यों के झगड़े सीधे यहीं शुरू होते थे), अपीलीय (हाई कोर्ट के फैसलों के खिलाफ यहाँ अपील होती थी) और परामर्शदात्री (वायसराय को कानूनी सलाह देना)। आज हमारे सुप्रीम कोर्ट के पास भी ठीक यही तीन अधिकारिताएं हैं।
प्रश्न : 1935 के अधिनियम के अंतर्गत गठित फेडरल न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध अपील की जा सकती थी
उत्तर : प्रिवी कॉंसिल में
सरल व्याख्या : भले ही यह भारत की सबसे बड़ी अदालत थी, लेकिन यह दुनिया की आख़िरी अदालत नहीं थी। अगर कोई इसके फैसले से भी नाखुश था, तो वह इसके खिलाफ इंग्लैंड (लंदन) की सबसे बड़ी कोर्ट यानी प्रिवी काउंसिल में जाकर अंतिम अपील कर सकता था।
प्रश्न : किस अधिनियम के द्वारा 'संवैधानिक निरंकुशता का सिद्धांत' प्रवृत्त किया गया था
उत्तर : भारत सरकार अधिनियम, 1935 द्वारा
सरल व्याख्या : चूँकि इस पूरे कानून को ब्रिटिश संसद ने बनाया था और इसमें भारतीय जनता या हमारी संसद को संविधान बदलने का कोई हक नहीं था, साथ ही वायसराय को असीमित शक्तियां मिली हुई थीं, इसीलिए कानूनी जानकारों ने इस व्यवस्था को ‘संवैधानिक निरंकुशता’ (Constitutional Autocracy) का नाम दिया था।
प्रश्न : किस अधिनियम के द्वारा बर्मा तथा अदन को भारत के शासन से पृथक कर दिया गया था
उत्तर :भारत शासन अधिनियम, 1935 द्वारा सरल व्याख्या : यह बहुत बड़ा भौगोलिक बदलाव था। इस कानून के तहत वर्ष 1937 में बर्मा (जिसे आज हम म्याँमार देश कहते हैं) और अदन (यमन का हिस्सा) को हमेशा के लिए भारत देश की सीमाओं से अलग (पृथक) कर के एक स्वतंत्र इलाका बना दिया गया था।
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